फूल और काँटा
एक ही जगह, एक ही पौधा
हरिऔध की कविता 'फूल और काँटा' शुरू कीजिए, जहाँ दोनों एक ही पौधे पर उगते हैं।
सोचिए: गुलाब की एक ही डाली पर खुशबूदार फूल भी होता है और चुभने वाला काँटा भी। एक ही पौधा, पर स्वभाव बिलकुल अलग! यही है 'मल्हार' का तीसरा पाठ: अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की कविता 'फूल और काँटा'।
कविता पहले बताती है कि दोनों में क्या-क्या एक जैसा है: "हैं जनम लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता।" जन्म एक ही जगह, पालने वाला एक ही पौधा।
"रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता।" चाँद भेदभाव नहीं करता; दोनों पर बराबर चाँदनी डालता है।
"मेह उन पर है बरसता एक सा, एक सी उन पर हवायें हैं बही।" (मेह = वर्षा, बादल।) बारिश भी दोनों पर बराबर, हवा भी बराबर।
गिनती पूरी हुई:
- जन्म की जगह
- पालने वाला पौधा
- चाँदनी
- वर्षा
- हवा
पाँचों बातें बिलकुल एक-सी! सर्दी, गर्मी, धूप, बारिश, सब दोनों को बराबर मिला।
और फिर कविता मुड़ती है: "पर सदा ही यह दिखाता है हमें, ढंग उनके एक से होते नहीं।" (ढंग = तरीका, व्यवहार।) जो मिला, वह एक-सा था; पर जो किया, वह एक-सा नहीं!
यही कविता का ढाँचा है: पहले समानताएँ, फिर अंतर, और अंत में एक विचार। कवि ने समानताएँ पहले क्यों रखीं? क्योंकि जब तक यह साबित न हो कि दोनों को एक जैसा मौक़ा मिला, तब तक अंतर का कोई अर्थ नहीं बनता।
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