फूल और काँटा
काँटे का ढंग और फूल का ढंग
कविता में काँटे और फूल के अलग-अलग ढंग पढ़िए।
अब कविता काँटे का ढंग बताती है, चार काम गिनाकर:
"छेद कर काँटा किसी की उँगलियाँ, फाड़ देता है किसी का वर बसन।" (बसन = वस्त्र; वर बसन = अच्छा, सुंदर कपड़ा।) काँटा उँगली छेदता है और अच्छा कपड़ा फाड़ देता है।
"प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर, भौंर का है बेध देता श्याम तन।"
- पर कतरना = पंख काट देना
- बेधना = छेद देना
- श्याम तन = काला शरीर (भौंरा काला होता है)
तो काँटे के चारों काम नुक़सान के हैं: उँगली छेदना, कपड़ा फाड़ना, तितली के पंख काटना, भौंरे का शरीर बेधना।
अब फूल का ढंग: "फूल लेकर तितलियों को गोद में, भौंर को अपना अनूठा (अनोखा) रस पिला।" फूल तितलियों को ऐसे गोद में लेता है जैसे माँ बच्चे को, और भौंरे को अपना मीठा रस पिलाता है।
"निज सुगंधों औ निराले रंग से, है सदा देता कली का जी खिला।"
- निज = अपना
- निराला = अनोखा
- जी खिलाना = मन खुश कर देना
अब दोनों को आमने-सामने रखिए:
| जीव | काँटा | फूल |
|---|---|---|
| तितली | पंख काटता है | गोद में लेता है |
| भौंरा | शरीर बेधता है | रस पिलाता है |
वही जीव, वही मौक़ा, बिलकुल उलटा व्यवहार! इससे साबित होता है कि अंतर परिस्थिति में नहीं, स्वभाव में है।
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