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फूल और काँटा

कुल और बड़प्पन

जानिए कि कविता कुल और बड़प्पन के बारे में क्या कहती है।

अब कविता दोनों का नतीजा बताती है: "है खटकता एक सब की आँख में, दूसरा है सोहता सुर शीश पर।"

  • खटकना = चुभना, बुरा लगना
  • सोहना = शोभा देना, सजना
  • सुर = देवता; शीश = सिर

यानी काँटा सबकी आँखों में चुभता है (सब उससे बचना चाहते हैं), और फूल देवताओं के सिर पर सजता है (भगवान को चढ़ाया जाता है)। दोनों एक ही पौधे से निकले, और नतीजा कितना अलग!

अब आख़िरी दो पंक्तियाँ, जिनमें पूरा विचार है: "किस तरह कुल की बड़ाई काम दे, जो किसी में हो बड़प्पन की कसर।"

  • कुल = वंश, परिवार, ख़ानदान
  • बड़ाई = प्रशंसा, ऊँचा होना
  • कसर = कमी

पूरा अर्थ: अगर किसी व्यक्ति में खुद बड़प्पन की कमी हो, तो उसके परिवार का बड़ा नाम उसके किसी काम नहीं आता। काँटा भी तो उसी पौधे का है जिसका फूल; कुल एक ही है, पर काँटे को उससे कुछ नहीं मिला।

अपने जीवन से सोचिए: कोई बहुत प्रसिद्ध, इज़्ज़तदार परिवार में पैदा हुआ, पर दूसरों को चोट पहुँचाता है, बड़ों से बदतमीज़ी करता है, तो परिवार का नाम उसे नहीं बचा सकता। और कोई साधारण परिवार में पैदा हुआ, पर उसके अच्छे काम उसे नाम दिला देते हैं।

निष्कर्ष: व्यक्ति का सम्मान उसके कुल से नहीं, उसके अपने कामों से होता है। बड़प्पन व्यक्ति के गुणों, स्वभाव और कर्मों से पहचाना जाता है, ख़ानदान के नाम से नहीं।

कुल तो दोनों का एक ही है — पर काँटा आँख में चुभता है और फूल देवता के सिर सजता है।

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