फूल और काँटा
फूल और काँटा प्रतीक के रूप में
समझिए कि इस कविता में फूल और काँटा किन बातों के प्रतीक हैं।
पृष्ठ 32 पर एक ज़रूरी बात: इस कविता में 'फूल' और 'काँटा' के उदाहरण से लोगों के स्वभाव के अंतर और समानताओं की ओर इशारा किया गया है।
यानी फूल और काँटा यहाँ प्रतीक हैं। प्रतीक वह चीज़ है जो खुद तो एक चीज़ हो, पर किसी दूसरी बड़ी बात का संकेत करे।
कविता कहीं नहीं कहती 'अच्छा आदमी' या 'बुरा आदमी'। वह बस फूल और काँटे की बात करती है, और पाठक खुद समझ जाता है कि बात इंसानों की है। यही प्रतीक की ताक़त है!
| फूल किसका प्रतीक | कविता में कहाँ से |
|---|---|
| दया, कोमलता | तितलियों को गोद में लेना |
| परोपकार (दूसरों का भला) | भौंरे को रस पिलाना |
| आनंद, प्रसन्नता | कली का जी खिलाना |
| सुंदरता | सुगंध और निराले रंग |
| अच्छाई, सुख, प्रेम | पूरा व्यवहार |
| काँटा किसका प्रतीक | कविता में कहाँ से |
|---|---|
| पीड़ा | उँगली छेदना, तन बेधना |
| कठोरता | पंख कतरना |
| स्वार्थ | किसी को कुछ न देना, बस घायल करना |
| बुराई, दुख | पूरा व्यवहार |
ध्यान दीजिए: कविता ने काँटे को सज़ा नहीं दी; उसने बस दिखाया कि काँटा सबकी आँख में खटकता है। बुरा स्वभाव अपनी सज़ा खुद है।
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