गिरिधर कविराय की कुंडलिया
एक मात्रा के वाक्य
कुंडलिया की एक पंक्ति से एक मज़ेदार शब्द-खेल खेलिए।
पृष्ठ 81 पर 'आज की पहेली' एक मज़ेदार शब्द-खेल है, जो कुंडलिया की ही एक पंक्ति से निकला है।
पंक्ति: "खान पान सन्मान"। तीनों शब्दों में केवल एक मात्रा बार-बार आई है: आ की मात्रा ( ा )! खा-न, पा-न, सन्-मा-न। कोई दूसरी मात्रा नहीं।
पाठ दो और वाक्य देता है जिनमें केवल ई की मात्रा है:
- "नीली नदी धीमी थी।"
- "चींटी चीनी जीम गई।" (जीमना = खाना; यानी चींटी चीनी खा गई!)
दोनों में केवल एक मात्रा, और फिर भी अर्थ है।
अब आप ऐसे वाक्य बनाइए, अलग-अलग मात्राओं के लिए: आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।
दो नियम:
- वाक्य का कोई न कोई अर्थ होना चाहिए; केवल शब्द जोड़ देना काफ़ी नहीं
- एक वाक्य में केवल एक ही मात्रा बार-बार, या बिना मात्रा वाले शब्द
'कब', 'घर', 'चल' जैसे बिना मात्रा वाले शब्द हर वाक्य में चल जाएँगे; यही इस खेल को संभव बनाते हैं!
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