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गिरिधर कविराय की कुंडलिया

हँसी और आज का जीवन

हँसी के बारे में सोचिए और कुंडलिया को आज के जीवन से जोड़िए।

पृष्ठ 80 पर 'हँसी' नाम का भाग पहली कुंडलिया के तीन शब्दों से शुरू होता है: "जग में होत हँसाय।" कुंडलिया कहती है कि बिना सोचे काम करने पर दुनिया हँसती है। पर पाठ एक और सवाल उठाता है।

"कभी-कभी लोग दूसरों की ग़लतियों पर ही नहीं, उनके किसी भी काम पर हँस देते हैं।" यानी हँसी हमेशा किसी ग़लती की वजह से नहीं होती; कई बार बिना कारण भी होती है।

पाठ पूछता है: "सोचिए, कोई आपकी किसी भूल पर हँस रहा है। आप क्या कहेंगे या करेंगे ताकि उसे एहसास हो जाए कि इस बात पर हँसना ठीक नहीं?" ध्यान दीजिए: पाठ ग़ुस्सा करने को नहीं कहता; वह पूछता है कि समझाया कैसे जाए।

और उससे पहले: "दोनों स्थितियों में आपको कैसा लगता है, और दूसरों को कैसा लगता होगा?" यानी जब आप पर कोई हँसता है, और जब आप किसी पर हँसते हैं। दोनों तरफ़ से सोचना ही समझदारी है।

पृष्ठ 79 पर एक बड़ा सवाल: "कुंडलिया में सैकड़ों साल पहले कही बातें क्या आपके लिए भी उपयोगी हैं? कैसे?"

उत्तर अगले ही भाग में मिल जाता है! गिरिधर कविराय ने अठारहवीं सदी में लिखा: बिना विचारे किया काम पछतावा देता है। और आज? वही बात मोबाइल के ठगी संदेशों पर लागू होती है, जहाँ जल्दी में दबाया एक बटन बड़ा नुक़सान कर सकता है। समय बदला, चीज़ें बदलीं, पर 'रुककर सोचो' वाली सीख वैसी की वैसी काम की है!

बात सैकड़ों साल पुरानी है पर काम आज भी करती है — क्योंकि 'रुककर सोचो' कभी पुराना नहीं होता।

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