वर्षा-बहार
नभ में छटा अनूठी
मुकुटधर पाण्डेय की कविता 'वर्षा-बहार' पढ़िए और बादलों से भरे आकाश की छटा देखिए।
याद कीजिए मई-जून की भयंकर गर्मी, जब सब परेशान हो जाते हैं। और फिर पहली बारिश! कितना अच्छा लगता है न? 'मल्हार' का सातवाँ पाठ मुकुटधर पाण्डेय की कविता 'वर्षा-बहार' इसी ख़ुशी की कविता है: वर्षा ऋतु के एक के बाद एक सुंदर दृश्य।
"वर्षा-बहार सब के, मन को लुभा रही है। नभ में छटा अनूठी, घनघोर छा रही है।"
- नभ = आकाश
- छटा = शोभा, सुंदरता
- अनूठी = अनोखी
- घनघोर = घने बादलों से भरा
इतनी तेज़ धूप के बाद आसमान में काले बादल कितने सुंदर लगते हैं!
"बिजली चमक रही है, बादल गरज रहे हैं। पानी बरस रहा है, झरने भी ये बहे हैं।" ये चारों काम एक साथ हो रहे हैं, और चारों बताते हैं: वर्षा आ गई!
"चलती हवा है ठंडी, हिलती हैं डालियाँ सब। बागों में गीत सुंदर, गाती हैं मालिनें अब।" ठंडी हवा से पेड़ों की डालियाँ हिलती हैं, और बाग़ में मालिनें (बाग़ में काम करने वाली स्त्रियाँ) सुंदर गीत गाती हैं।
"तालों में जीव जलचर, अति हैं प्रसन्न होते।"
- ताल = तालाब
- जलचर = पानी में रहने वाले जीव (मछली, कछुआ, घोंघा ...)
- अति = बहुत
तालाब के सारे जीव बहुत खुश हैं।
"फिरते लखो पपीहे, हैं ग्रीष्म ताप खोते।" (लखो = देखो; पपीहा = एक पक्षी, जो वर्षा की प्रतीक्षा से जुड़ा माना जाता है; ग्रीष्म ताप खोते = गर्मी की तपन भूल रहे हैं।) देखो, पपीहे घूम रहे हैं, गर्मी भूलकर!
ध्यान दीजिए कवि किस क्रम से चलता है: पहले आकाश, फिर बिजली-बादल-पानी, फिर हवा और डालियाँ, फिर बाग़ के लोग, फिर तालाब के जीव। ऊपर से नीचे, दूर से पास, जैसे कोई कैमरा धीरे-धीरे नीचे उतर रहा हो!
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