वर्षा-बहार
मोर, गुलाब और हंस
कविता में बरसात के समय मोर, गुलाब, हंस और लोगों को देखिए।
कविता आगे बढ़ती है, और अब जीव-जंतु और मनुष्य दोनों आते हैं।
"करते हैं नृत्य वन में, देखो ये मोर सारे। मेंढक लुभा रहे हैं, गाकर सुगीत प्यारे।" वर्षा में मोर पंख फैलाकर नाचते हैं, और मेंढक टर्र-टर्र करते हैं, पर कवि उसे 'सुगीत प्यारे' (प्यारा सुंदर गीत) कहता है!
मज़ेदार बात: मेंढक की आवाज़ को आमतौर पर बेसुरा माना जाता है। पर वर्षा के आनंद में कवि को वह भी मधुर लगती है। जब मन खुश हो, तो बेसुरी आवाज़ें भी अच्छी लगने लगती हैं!
"खिलता गुलाब कैसा, सौरभ उड़ा रहा है। बागों में खूब सुख से, आमोद छा रहा है।" (सौरभ = सुगंध; आमोद = आनंद, हर्ष, खुशी।)
"चलते हैं हंस कहीं पर, बाँधे कतार सुंदर। गाते हैं गीत कैसे, लेते किसान मनहर।" (कतार = पंक्ति; मनहर = मन को हरने वाला, मनोहर।) हंस पंक्ति में उड़ते हैं, और किसान मनोहर गीत गाते हैं।
किसान का गीत बहुत ज़रूरी है! वर्षा का सबसे बड़ा अर्थ किसान के लिए है: उसके खेतों को पानी मिला, अब वह बुवाई (बीज बोना) करेगा। उसकी फ़सल पानी पर निर्भर है, इसीलिए वह गा रहा है।
आख़िरी पंक्तियाँ: "इस भाँति है अनोखी, वर्षा बहार भू पर। सारे जगत की शोभा, निर्भर है इसके ऊपर।" (भू = पृथ्वी।) सोचिए: अगर बस गर्मी रहे और कभी बारिश न हो, तो क्या प्रकृति सुंदर रहेगी? क्या पशु-पक्षी खुश रहेंगे? नहीं! कविता बताती है कि यह सुंदरता ही जीवन का आधार है।
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