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बिरजू महाराज से साक्षात्कार

संघर्षों से भरा बचपन

जानिए कि साक्षात्कार क्या होता है और बिरजू महाराज के बचपन के बारे में पढ़िए।

'मल्हार' का आठवाँ पाठ एक साक्षात्कार है। साक्षात्कार = इंटरव्यू: किसी से प्रश्न पूछकर की गई बातचीत, जिसे लिखकर दूसरों तक पहुँचाया जाए। यह गद्य में है।

किससे? पंडित बिरजू महाराज से, जो कथक नृत्य के बहुत बड़े कलाकार थे। "कथक की कला उन्हें विरासत में मिली थी" (यानी परिवार से)। भारत ही नहीं, विदेशों में भी लोग उनकी प्रस्तुतियों को याद करते हैं। उन्हें पद्म विभूषण सम्मान मिला था।

और प्रश्न कौन पूछ रहा है? "आपके जैसे ही कुछ बच्चे": श्रेया, तनुश्री और माणिक।

पाठ कहता है: "बिरजू महाराज का जीवन शास्त्रीय संगीत के रागों के समान ही उतार-चढ़ाव भरा था।" जैसे राग में सुर ऊपर-नीचे जाते हैं, वैसे ही जीवन में कभी सुख, कभी दुख। और सफलता के लिए उन्होंने कठिन साधना (बहुत मेहनत) की थी।

श्रेया का पहला प्रश्न: "सुना है कि आपका बचपन संघर्षों से भरा हुआ था। अपने बचपन के बारे में कुछ बताएँगे?"

पहलेपिता के देहांत के बाद
परिवार 'छोटे नवाब' कहलाता थाआर्थिक परेशानियाँ (पैसे की तंगी) बढ़ने लगीं
हवेली के दरवाज़े पर आठ-आठ सिपाहियों का पहराजिन डिब्बों में तीन-चार लाख के हार थे, वे ख़ाली पड़े थे

उनका निष्कर्ष: "जीवन में उतार-चढ़ाव तो होता ही है। सब समय का चक्र है।"

उस समय उनकी "सबसे बड़ी सहयोगी मेरी माँ थीं।" गुज़ारा कैसे होता था?

  • कभी क़र्ज़ लेते थे
  • कभी पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचते थे
  • ज़री = सोने-चाँदी के तार से की गई कढ़ाई। साड़ी जलाने पर कपड़ा जल जाता, और धातु बच जाती, जिसे बेचा जाता था।

"दिन में खाना खाते थे तो रात को कई बार नहीं भी खाते थे।" और ऐसे कठिन समय में भी अम्मा कहती थीं (पाठ की सबसे ज़रूरी पंक्ति): "खाने को भले ही चना मिले या कुछ भी न मिले पर अभ्यास ज़रूर करो।" अभ्यास करते रहोगे, तो हुनर दिन-ब-दिन निखरेगा।

अम्मा कहती थीं — खाने को कुछ न मिले तब भी अभ्यास ज़रूर करो, और यही उनकी सबसे बड़ी सहयोगी बात थी।

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