बिरजू महाराज से साक्षात्कार
गुरु और गंडा
जानिए कि बिरजू महाराज ने कथक किससे और कैसे सीखा।
तनुश्री का प्रश्न: "आपने कथक किससे सीखा?"
उत्तर: "मेरे गुरु थे मेरे पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज।" तीनों गुरु उनके अपने परिवार से थे।
"घर में चूँकि कथक का माहौल था, अतः औपचारिक प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही मैं देख-देखकर कथक सीख गया था, और नवाब के दरबार में नाचने भी लगा था।" औपचारिक प्रशिक्षण = नियम से, विधिवत दी जाने वाली शिक्षा। वे रोज़ घर में नृत्य देखते थे, इसलिए सिखाए बिना ही बहुत कुछ सीख गए।
अब 'गंडा' की परंपरा: "कथक की तालीम शुरू करते समय गुरु शिष्यों को गंडा (ताबीज़) बाँधते हैं और शिष्य गुरु को भेंट देता है।"
- तालीम = शिक्षा
- गंडा = एक ताबीज़ (धागा), जो गुरु शिष्य की कलाई पर बाँधता है
- भेंट = उपहार
जब उनकी तालीम की बारी आई, बाबूजी ने कहा: "भेंट मिलने पर ही गंडा बाँधूँगा।" अपना बेटा था, फिर भी परंपरा नहीं छोड़ी! तब "अम्मा ने मेरे दो कार्यक्रमों की कमाई बाबूजी को भेंट के रूप में दे दी।" यानी भेंट बेटे की अपनी कमाई से गई।
"'गंडा' गुरु और शिष्य के बीच पवित्र रिश्ता होता है।"
और बिरजू महाराज ने क्या बदला? "मैंने अब इस रस्म को उल्टा कर दिया है। कई वर्षों तक नृत्य सिखाने के बाद जब देखता हूँ कि शिष्य में सच्ची लगन है, तभी गंडा बाँधता हूँ।"
| पुरानी रस्म | बिरजू महाराज की रस्म |
|---|---|
| तालीम के आरंभ में गंडा | कई वर्ष सिखाने के बाद, अंत में गंडा |
| परख: शिष्य भेंट दे सकता है या नहीं | परख: शिष्य में लगन है या नहीं |
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.