बिरजू महाराज से साक्षात्कार
कथक की परंपरा
कथक नृत्य की पुरानी परंपरा के बारे में जानिए।
माणिक का प्रश्न: "कथक की शुरुआत कब हुई?"
"कथक की परंपरा बहुत पुरानी है। 'महाभारत' के आदिपर्व और 'रामायण' में इसकी चर्चा मिलती है।"
"पहले कथक रोचक और अनौपचारिक रूप से कथा कहने का ढंग होता था। तब यह मंदिरों तक ही सीमित था।" 'कथक' शब्द 'कथा' से ही बना है। आज भी कथक में एक कहानी चलती है, जो चेहरे के हाव-भाव और हाथों की मुद्राओं से बताई जाती है।
"हमारे लखनऊ घराने के लोग मूलतः बनारस-इलाहाबाद के बीच हरिया गाँव के रहने वाले थे। वहाँ 989 कथिकों के घर हुआ करते थे। कथिकों का एक तालाब अभी भी है।" (कथिक = कथा कहने वाले।) पूरा गाँव कथिक परिवारों का था!
अब एक मज़ेदार कहानी। गाँव में बैरगिया नाला है। एक बार नौ कथिक उसके पास से गुज़र रहे थे कि तीन डाकू आ पहुँचे। कुछ कथिक डर गए, "किंतु उन कथिकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक में मग्न हो गए।" डाकू लूटने आए थे, और भूल गए कि क्यों आए थे!
तब से यह पद प्रचलित हो गया:
"बैरगिया नाला जुलुम जोर, नौ कथिक नचावें तीन चोर। जब तबला बोले धीन-धीन, तब एक-एक पर तीन-तीन।"
यानी नौ कथिकों ने तीन चोरों को ही नचा दिया! यह कला की शक्ति की कहानी है: बिना हथियार के भी कला किसी को बदल सकती है।
घरानों का क्रम: पहले लखनऊ घराना, फिर जयपुर घराना, फिर बनारस घराना। इसके अलावा रायगढ़ के महाराज चक्रधर की भी अपनी अलग शैली थी।
घराना = कलाकारों का एक समुदाय या कुटुंब (परिवार), जो संगीत-नृत्य की एक ख़ास शैली साझा करता है, और जिसमें वह शैली पीढ़ी-दर-पीढ़ी सिखाकर आगे बढ़ाई जाती है।
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