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चिड़िया

पीपल की ऊँची डाली पर

आरसी प्रसाद सिंह की कविता 'चिड़िया' शुरू कीजिए और पीपल की ऊँची डाली पर बैठी चिड़िया से मिलिए।

सुबह-सुबह खिड़की पर बैठी चिड़िया की 'ची-ची' आपने सुनी होगी। कितनी प्यारी लगती है! पर क्या कभी सोचा कि वह हमें कुछ सिखा भी रही है? 'मल्हार' का नौवाँ पाठ आरसी प्रसाद सिंह की कविता 'चिड़िया' यही बताती है।

"पीपल की ऊँची डाली पर बैठी चिड़िया गाती है! तुम्हें ज्ञात क्या अपनी बोली में संदेश सुनाती है?" (ज्ञात = पता।) कवि हमसे पूछता है: क्या तुम्हें पता है कि चिड़िया सिर्फ़ गाती नहीं, कुछ कहती है?

"चिड़िया बैठी प्रेम-प्रीति की रीति हमें सिखलाती है! वह जग के बंदी मानव को मुक्ति-मंत्र बतलाती है!"

  • रीति = तरीक़ा
  • बंदी = क़ैद में पड़ा हुआ
  • मुक्ति-मंत्र = छूटने का उपाय

मनुष्य 'जग का बंदी' क्यों? वह धन, दौलत, आराम के पीछे दौड़ता है, सबसे होड़ (प्रतियोगिता) करता है, और इसी में बँध जाता है। माता-पिता, बच्चों, परिवार को समय तक नहीं दे पाता; उसके भीतर का प्रेम कम होता जाता है। और चिड़िया, जो पिंजरे में नहीं, उसे छूटने का रास्ता बताती है!

अब पक्षियों की सूची: "वन में जितने पंछी हैं, खंजन, कपोत, चातक, कोकिल; काक, हंस, शुक आदि वास करते सब आपस में हिलमिल!"

पक्षीअर्थ
खंजनएक छोटा पक्षी (काले-सफ़ेद पंख)
कपोतकबूतर
चातकवर्षा की बूँद की प्रतीक्षा करने वाला माना जाने वाला पक्षी
कोकिलकोयल
काककौआ
हंसहंस
शुकतोता

सात अलग-अलग पक्षी, फिर भी सब हिलमिल (मिलकर) रहते हैं, कभी लड़ते नहीं। कवि जानबूझकर लंबी सूची देता है: अलग होकर भी मेल संभव है। संदेश: हम भी आपस में लड़ना छोड़ें!

"सब मिल-जुलकर रहते हैं वे, सब मिल-जुलकर खाते हैं; आसमान ही उनका घर है; जहाँ चाहते, जाते हैं!" रहना साथ, खाना साथ, और जाने की पूरी स्वतंत्रता। यह समानता और एकता का संकेत है।

चिड़िया प्रेम-प्रीति की रीति सिखाती है और जग के बंदी मनुष्य को मुक्ति का मंत्र बताती है।

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