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चिड़िया

न लोभ, न पाप

जानिए कि कविता पक्षियों के जीवन के ढंग के बारे में क्या कहती है।

अब कविता पक्षियों के जीने का ढंग बताती है, और हर बात के पीछे मनुष्य से एक चुपचाप तुलना है।

"रहते जहाँ, वहाँ वे अपनी दुनिया एक बसाते हैं; दिन भर करते काम, रात में पेड़ों पर सो जाते हैं!" पक्षी आलसी नहीं: सूरज उगा तो दिन शुरू, अँधेरा हुआ तो सो गए।

हम क्या करते हैं? रात देर तक मोबाइल, सुबह देर तक नींद, और दिनचर्या बिगड़ जाती है। पक्षियों से सीखिए: जमकर काम, और जमकर आराम। लगातार काम करते रहना भी ठीक नहीं; शरीर को आराम चाहिए।

"उनके मन में लोभ नहीं है, पाप नहीं, परवाह नहीं; जग का सारा माल हड़पकर जाने की भी चाह नहीं।"

  • लोभ = लालच
  • हड़पना = दूसरे का छीनकर ले लेना
  • चाह = इच्छा

'परवाह नहीं' क्यों? जो किसी का छीनकर लाता है, उसे हमेशा डर रहता है कि कोई वापस न ले ले। वह बेचैन रहता है। पक्षी ने किसी का कुछ लिया ही नहीं, इसलिए उसे कोई चिंता नहीं!

अब सबसे ज़रूरी पंक्तियाँ: "जो मिलता है अपने श्रम से, उतना भर ले लेते हैं; बच जाता जो, औरों के हित, उसे छोड़ वे देते हैं!" (श्रम = मेहनत; हित = भला।)

इसमें बातें अलग-अलग हैं:

  • जो अपनी मेहनत से मिले, वही लेते हैं; दूसरों का नहीं लेते
  • उतना भर, यानी ज़रूरत जितना; ज़्यादा जमा नहीं करते
  • जो बच जाए, उसे दूसरों के लिए छोड़ देते हैं

यही है श्रम और संतोष।

"सीमा-हीन गगन में उड़ते, निर्भय विचरण करते हैं; नहीं कमाई से औरों की अपना घर वे भरते हैं!"

  • सीमा-हीन = जिसकी कोई सीमा न हो
  • गगन = आकाश
  • निर्भय = बिना डरे
  • विचरण = घूमना-फिरना

वे दूसरों की कमाई नहीं खाते, इसीलिए बिना डर के उड़ते हैं। 'निर्भय विचरण' का भाव है स्वतंत्रता और निर्बाध जीवन।

पक्षी अपने श्रम से उतना ही लेते हैं जितना चाहिए, और बचा हुआ दूसरों के हित में छोड़ देते हैं।

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