चिड़िया
सोने की कड़ियाँ तोड़ो
पढ़िए कि कविता में पक्षी स्वयं मनुष्य से क्या कहते हैं।
अब कविता में पक्षी स्वयं बोलते हैं, और सीधे मनुष्य से बात करते हैं।
"वे कहते हैं, मानव! सीखो तुम हमसे जीना जग में; हम स्वच्छंद और क्यों तुमने डाली है बेड़ी पग में?"
- स्वच्छंद = अपनी इच्छा से चलने वाला, स्वतंत्र
- बेड़ी = पैरों में डाली जाने वाली ज़ंजीर
- पग = पैर
प्रश्न पर ध्यान दीजिए: "क्यों तुमने डाली है बेड़ी?" बेड़ी किसी और ने नहीं, मनुष्य ने ख़ुद डाली है! कौन-सी बेड़ियाँ? लोभ (लालच), मोह, ईर्ष्या (जलन), द्वेष। यही कविता का सबसे तीखा प्रश्न है।
"तुम देखो हमको, फिर अपनी सोने की कड़ियाँ तोड़ो।" (कड़ी = ज़ंजीर की एक लड़ी।) ज़ंजीर, और वह भी सोने की! यह कविता का सबसे सुंदर रूपक है।
सोना क़ीमती है, फिर भी ज़ंजीर बाँधने के लिए ही बनी है। यानी धन-दौलत और सुविधाएँ देखने में क़ीमती लगती हैं, पर वे बंधन हैं। उनमें फँसा आदमी न चैन पाता है, न आज़ादी; बस डर। पाठ इसका भाव 'बंधन और लालच' बताता है।
"ओ मानव! तुम मानवता से द्रोह-भावना को छोड़ो!" (द्रोह = विरोध, शत्रुता।) मनुष्य ही मनुष्यता के विरुद्ध हो गया है। लालच, जलन और द्वेष छूटें, तो उनकी जगह आएँगे प्रेम, दया, आदर और दूसरों की मदद का भाव। यही मानवता है।
अंतिम पंक्तियाँ कविता को वहीं लौटा लाती हैं जहाँ से वह चली थी: "पीपल की डाली पर चिड़िया यही सुनाने आती है; बैठ घड़ी भर, हमें चकित कर, गा-कर फिर उड़ जाती है।" (घड़ी भर = थोड़ी देर; चकित = हैरान।)
चिड़िया रुकती नहीं। वह थोड़ी देर गाकर हमें सोचने पर मजबूर करती है: क्या हम ठीक जी रहे हैं? और उड़ जाती है। सुनना या न सुनना हमारे ऊपर छोड़ जाती है।
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