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स्वदेश

पंक्तियों पर चर्चा और सोच-विचार

कविता की कुछ खास पंक्तियों पर रुककर सोचिए और चर्चा कीजिए।

पंक्तियों पर चर्चा. इन पंक्तियों पर रुककर सोचिए: 'निश्चित है निस्संशय निश्चित, है जान एक दिन जाने को। है काल-दीप जलता हरदम, जल जाना है परवानों को॥'

दो शब्द:

  • 'काल-दीप' = समय का दीपक, जो हमेशा जलता रहता है (समय कभी नहीं रुकता);
  • 'परवाना' = वह पतंगा जो दीपक के पास मँडराता है और आखिर में उसी में जल जाता है।

दोनों चित्र जोड़कर कवि कहता है: मृत्यु निश्चित है, इसमें कोई शक नहीं। तो प्रश्न यह नहीं कि मरना है या नहीं; प्रश्न यह है कि किस बात के लिए जीना और मरना है।

सोच-विचार 1. 'संसार-संग' चलने का क्या अर्थ है? संसार का अर्थ केवल धरती नहीं, अपने आसपास के लोग भी हैं। जो उनके साथ नहीं चलता, वह अकेला पड़ जाता है, और अकेले व्यक्ति का संसार नहीं बनता।

सोच-विचार 2. 'उस पर है नहीं पसीजा जो/क्या है वह भू का भार नहीं।' 'भू का भार' = धरती पर बोझ। जो देश से इतना कुछ पाकर भी नहीं पिघलता, वह धरती पर बोझ ही है।

सोच-विचार 3. 'देश-प्रेम' क्या है? इसका कोई एक उत्तर नहीं। कविता खुद कई उत्तर देती है: जोश, साहस, समाज के साथ चलना, भावों से भरा होना।

रचना का रूप. यह एक आह्वान गीत है: पुकारता है, प्रेरित करता है, उत्साह जगाता है। इसकी और विशेषताएँ:

  • बार-बार लौटती टेक;
  • प्रश्नों का प्रयोग;
  • छोटी-छोटी पंक्तियाँ, जिन्हें सब मिलकर गा सकें।
काल-दीप और परवाना: प्रश्न मरने का नहीं, किस बात के लिए जीने का है।

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