तरुण के स्वप्न
स्वप्न की विरासत
नेताजी के भाषण 'तरुण के स्वप्न' का पहला भाग पढ़िए और जानिए कि उद्बोधन क्या होता है।
यह कैसा पाठ है? न कहानी, न निबंध: यह एक भाषण का अंश है, एक उद्बोधन (जगाने वाला भाषण)।
कब और कहाँ? सुभाषचंद्र बोस ने यह भाषण मेदिनीपुर (बंगाल) के जिला युवक-सम्मेलन में 29 दिसंबर 1929 को दिया। सुनने वाले युवा थे।
पहला वाक्य: "स्वप्न तो अनेकों ने देखा।" सपना देखना कोई नई बात नहीं।
एक नाम: "हमारे नेता स्वर्गीय देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न देखा था।" चित्तरंजन दास बोस के राजनीतिक गुरु थे; लोग उन्हें प्यार से 'देशबंधु' कहते थे।
दो सुंदर शब्द: "वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।"
- उत्स = स्रोत (जहाँ से कुछ निकलता है);
- निर्झर = झरना।
यानी वह सपना उनकी ताकत भी था और उनकी खुशी भी।
सबसे ज़रूरी वाक्य: "उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।" उत्तराधिकारी वह है जिसे किसी के बाद उसकी चीज़ मिलती है। यहाँ चीज़ धन नहीं, एक सपना है।
उत्तराधिकारी होने का अर्थ केवल सपने को संजोकर रखना नहीं है। उसे पूरा करने का काम भी अब हमारा है।
सपना हर काम में: "इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं।" जैसे आपका डॉक्टर या पायलट बनने का सपना आपको रोज़ पढ़ने को उठाता है, वैसे ही यह सपना उनके हर काम के पीछे था।
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