दो गौरैया
कहानी की रचना और व्यंग्य
जानिए कि कहानी कैसे बनी है और उसमें व्यंग्य कैसे छिपा है।
एक खास वाक्य. "कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।"
यह वाक्य कहीं नहीं कहता कि पिताजी का मन बदल गया, फिर भी यही बताता है। शोर वही है; बदला केवल सुनने वाला है।
कहानी की और विशेषताएँ:
- बढ़ा-चढ़ाकर कहना: "जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो।"
- हास्य: माँ की सारी टिप्पणियाँ।
- सोचा कुछ और, हुआ कुछ और: पिताजी ने सोचा दरवाज़े बंद करने से गौरैयाँ चली जाएँगी; हुआ उलटा।
- दूसरों के मन का अनुमान: "शायद बूढ़ा है, उसे सर्दी बहुत लगती है।"
- प्राणियों के काम को नया नाम देना: चहचहाना = 'मल्हार गाना', चमगादड़ों का उड़ना = 'कसरत'।
व्यंग्य. 'छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!' व्यंग्य का अर्थ है हँसी-मज़ाक या उपहास के ज़रिए किसी कमी, बुराई या उलटी स्थिति को सामने लाना।
व्यंग्य में बात सीधे नहीं कही जाती; उलटे या इशारे से कही जाती है, ताकि उसमें चुटकी भी रहे और सोचने की बात भी।
झरोखे से. गाँवों और शहरों में गौरैया की संख्या लगातार घट रही है। इसलिए 20 मार्च को 'विश्व गौरैया दिवस' मनाया जाता है।
कारण:
- पेट्रोल से बने ज़हरीले यौगिक उन कीड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं जिन्हें गौरैया खाती है;
- शहरीकरण ने उनके घोंसले बनाने की जगहें छीन लीं।
पिताजी के घर में गौरैयों के लिए जगह की जो बहस चल रही थी, वह आज पूरे देश में चल रही है।
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