हरिद्वार
पत्थर पर भोजन
पढ़िए कि लेखक ने हरिद्वार में पत्थर पर भोजन करने का अनुभव कैसे लिखा।
अपना अनुभव. अब तक लेखक ने जगह का वर्णन किया; अब वे अपने अनुभव पर आते हैं।
वे दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिके थे, जहाँ चारों ओर से शीतल पवन आती थी। उनके साथ मित्र कल्लू जी भी थे, जो उनकी तरह 'परमानंदी' थे।
रात को ग्रहण हुआ, और उन्होंने ग्रहण में स्नान किया। दिन में श्री भागवत का पाठ (पारायण) किया।
पत्थर पर भोजन. पत्र का सबसे सुंदर प्रसंग: "एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। जल के छलके (छींटे) पास ही ठंढे-ठंढे आते थे।"
सार वाक्य: "उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।"
सोचिए, यह कौन कह रहा है। भारतेंदु काशी के धनी परिवार के थे; सोने की थाली उनके लिए कल्पना नहीं थी। फिर भी वे पत्थर पर बैठकर खाए भोजन को उससे बढ़कर बताते हैं।
निष्कर्ष: संतोष में सुख है। सुख चीज़ों में नहीं, मन की स्थिति में है।
इसीलिए वे लिखते हैं: "चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था।" यह मन की शांति और आध्यात्मिक अनुभव का वर्णन है।
अच्छी बनने वाली चीज़ें: "यहाँ और भी कई वस्तु अच्छी बनती हैं":
- जनेऊ यहाँ का अच्छा, महीन और उज्ज्वल (सफ़ेद) बनता है;
- यहाँ की कुशा (एक पवित्र घास) सबसे विलक्षण होती है, जिसमें से दालचीनी, जावित्री जैसी अच्छी सुगंध आती है। मानो यहाँ की घास भी पुण्य से महकती है।
अंत: "मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ।" शरीर लौट आया, मन नहीं लौटा। फिर विनम्र निवेदन: "निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा", यानी पत्रिका में छापेंगे। हस्ताक्षर: 'आपका मित्र, यात्री'।
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