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हरिद्वार

लेखक से परिचय

लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र के जीवन और उनके काम के बारे में जानिए।

लेखक. इस पत्र के लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं। उनका जीवनकाल 1850 से 1885 तक रहा, यानी केवल पैंतीस (35) साल।

इतने छोटे जीवन में उन्होंने जो किया, उसी कारण उन्हें 'आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक' (पिता) माना जाता है।

प्रसिद्ध उद्घोष: 'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल', यानी अपनी भाषा की उन्नति ही सारी उन्नति की जड़ है।

यह बात उस समय के संदर्भ में समझिए। तब अंग्रेज़ी राज था, और पढ़ाई और सरकारी काम की भाषा अंग्रेज़ी बनती जा रही थी। ऐसे समय में अपनी भाषा को उन्नति की जड़ कहना बड़ी बात थी।

विधाएँ: उन्होंने कविता, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत (यात्रा का वर्णन, दिन-ब-दिन) लिखे। यह पाठ यात्रा-लेखन का उदाहरण है।

पत्रिकाएँ: उन्होंने पत्रिकाएँ भी निकालीं: कविवचन सुधा (जिसमें यह पत्र छपा), हरिश्चंद्र मैगज़ीन, हरिश्चंद्र चंद्रिका, और स्त्रियों के लिए 'बालाबोधिनी'।

आख़िरी नाम पर ध्यान दीजिए: उन्नीसवीं सदी में स्त्रियों के लिए अलग पत्रिका निकालना एक बड़ा सामाजिक कदम था।

स्वर: उनकी रचनाओं में समाज-सुधार, राष्ट्र-प्रेम, अंग्रेज़ी शासन का विरोध और स्वाधीनता की भावना है।

प्रमुख कृतियाँ: 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'भारत-दुर्दशा', 'अंधेर नगरी' (एक प्रसिद्ध नाटक) और 'सरयूपार की यात्रा'।

'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल': अंग्रेज़ी राज के समय कही गई बात।

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