हरिद्वार
मेरी समझ से
पत्र के बारे में अपनी समझ परखिए।
मेरी समझ से. छह प्रश्न हैं। ज़्यादातर बातें हम देख चुके हैं; यहाँ आख़िरी दो पर खास ध्यान दीजिए।
प्रश्न 5. लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्य रूप से कैसा था? विकल्प: राजनीतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, प्राकृतिक।
प्रश्न आसान नहीं, क्योंकि पत्र में प्रकृति का बहुत वर्णन है और समाज की भी बात है। फिर भी उत्तर है 'आध्यात्मिक'।
कारण पत्र के अपने शब्दों में है:
- 'जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है';
- 'चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था';
- 'मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ'।
प्रकृति का वर्णन भी आख़िर में मन की उसी शांति तक ले जाता है।
प्रश्न 6. पत्र की भाषा का मुख्य लक्षण? विकल्प: कठिन शब्द और बोझिलता; मुहावरों का अधिक प्रयोग; सरलता और चित्रात्मकता; जटिलता और संक्षिप्तता।
उत्तर है 'सरलता और चित्रात्मकता'। पहली नज़र में यह चौंकाता है, क्योंकि भाषा पुरानी है और कुछ शब्द कठिन लगते हैं।
पर 'कठिन' और 'बोझिल' एक बात नहीं। लेखक का ढंग बहुत सरल है: वे हर बात चित्र बनाकर कहते हैं (पेड़ साधुओं जैसे, हरियाली गलीचे जैसी, जल चीनी के पने जैसा)। लेखक हर बात तुलना करके कहते हैं।
चित्रात्मकता = ऐसी भाषा, जिसे पढ़ते ही आँखों के सामने चित्र बन जाए। यही इस पत्र की सबसे बड़ी खूबी है।
गंगा तट का भोजन-प्रसंग किन मूल्यों को बढ़ाता है? संतोष, सादगी, और प्रकृति के पास रहने का आनंद।
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