हरिद्वार
सोच-विचार और कल्पना
सोच-विचार और कल्पना से पत्र को और गहराई से पढ़िए।
सोच-विचार और कल्पना. इन प्रश्नों का कोई एक उत्तर नहीं, पर हर एक पत्र को और गहराई से पढ़ने को कहता है।
1. 'टिकने योग्य' क्यों? लेखक ने उस जगह को टिकने योग्य कहा, क्योंकि चारों ओर से शीतल पवन आती थी। पर सोचिए: जिसे पत्थर पर भोजन सोने की थाली से अच्छा लगा, उसके लिए 'टिकने योग्य' का अर्थ केवल आराम नहीं, मन की शांति भी होगा।
2. 'श्री' और 'जी' क्यों? लेखक हमेशा 'श्री गंगा जी' लिखते हैं, कभी केवल 'गंगा' नहीं। यह आदर का चिह्न है। (इसी से अगले भाग का व्याकरण जुड़ता है: 'गंगा जी हैं', 'गंगा है' नहीं।)
3. आज के समाज से. 'पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।' यह आज कितना सच है? उत्तर आपका अपना होगा, पर उदाहरण देकर।
4. सबके लिए यात्रा. कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार किसी श्रवणबाधित (सुन न पाने वाले) या दृष्टिबाधित (देख न पाने वाले) व्यक्ति के साथ गए हैं।
अब पत्र फिर उसी नज़र से पढ़िए। जो देख नहीं सकता, उसके लिए भी बहुत कुछ है:
- सुनना: जल के वेग का शब्द;
- छूना: ठंडी हवा, जल के छींटे;
- सूँघना: कुशा की सुगंध;
- चखना: मीठा, ठंडा जल।
भारतेंदु ने इन सबका वर्णन किया है; पत्र में केवल देखने का नहीं, सभी इंद्रियों का अनुभव है।
5. 'मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ'. यह दिखाता है कि हरिद्वार ने उनके मन पर कितना गहरा असर डाला: शरीर लौट आया, मन नहीं लौटा।
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