एक टोकरी भर मिट्टी
सही और भ्रामक निष्कर्ष
कहानी के वाक्यों से सही और भ्रामक निष्कर्ष में अंतर करना सीखिए।
सही या भ्रामक? हर वाक्य के सामने दो निष्कर्ष हैं; एक भ्रामक (भटकाने वाला) है, और वह बहुत चतुराई से बनाया गया है।
1. 'अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी।'
भ्रामक: 'पोती का सहारा वृद्धा थी।' यहाँ दिशा उलट गई! वाक्य कह रहा है कि पोती वृद्धा का सहारा थी।
2. 'थैली गरम कर… कब्ज़ा कर लिया।'
भ्रामक: ज़मींदार ने 'वकीलों से सलाह लेकर न्यायपूर्वक कब्ज़ा किया।' पर 'थैली गरम करना' पैसे देने का मुहावरा है; इसमें न्याय कहीं नहीं। सही निष्कर्ष: उसने पैसे के बल पर, कानूनी चाल से झोंपड़ी ली।
7. 'कृपा करके इस टोकरी को ज़रा हाथ लगाइए।'
भ्रामक: 'वृद्धा ने चतुराई से ज़मींदार को शर्मिंदा करने की योजना बनाई।'
यह निष्कर्ष आकर्षक लगता है, क्योंकि नतीजा वही हुआ। पर वाक्य में केवल विनम्र निवेदन है: 'कृपा करके', 'ज़रा', 'जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूँ'। वह सचमुच मदद माँग रही थी, और सच ने अपने-आप अपना काम किया। (इसलिए 'वृद्धा ने शर्मिंदा करने की योजना बनाई' गलत है।)
8. 'आँसू की धारा बहने लगी।'
भ्रामक: वह डर गई कि ज़मींदार उसे फिर निकाल देगा। पर वाक्य में कारण दिया है: 'पुरानी बातों का स्मरण हुआ'। यह डर नहीं, याद है।
'धन-मद से गर्वित' होने का नतीजा: ज़मींदार अपना कर्तव्य भूल गए।
सीख: निष्कर्ष वाक्य के भीतर से निकलना चाहिए, बाहर से नहीं। जो बात वाक्य में नहीं है, वह कितनी भी ठीक लगे, निष्कर्ष नहीं बन सकती। भ्रामक निष्कर्ष अक्सर दिशा उलट देते हैं, या अपनी ओर से कुछ जोड़ देते हैं।
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