मत बाँधो
पाठ से आगे
कविता से आगे बढ़कर भाषा, कला और जीवन तक पहुँचिए।
पाठ से आगे. अब कविता से निकलकर भाषा, कला और जीवन तक चलिए।
1. अल्पविराम का खेल. दो वाक्य, शब्द वही, केवल अल्पविराम (,) की जगह बदली:
- 'रोको मत, जाने दो' → बिना रोके जाने दो;
- 'रोको, मत जाने दो' → जाने से रोको।
एक छोटे-से चिह्न ने अर्थ उलट दिया!
पुस्तक ने चित्र भी दिए हैं (सड़क पार करते बच्चे, वन्य जीव क्षेत्र, सैनिक की विदाई, मतदान केंद्र), और पूछा है कि किस चित्र पर कौन-सा वाक्य लगेगा।
2. चर्चा: एक का सपना, सबका सपना. किसी एक का देखा सपना बहुत लोगों का सपना बन जाता है। जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का भारत को आज़ाद कराने का सपना सब भारतीयों का सपना बन गया।
3. भारत के शिल्प. कविता के 'स्वर्ग बनाने का शिल्प' से यह अभ्यास निकला है। भारत में हज़ारों सालों से कई शिल्प हैं:
- काष्ठ (लकड़ी) शिल्प, मृत्तिका (मिट्टी) शिल्प, धातु (ताँबा, पीतल) शिल्प;
- काँच, वस्त्र, कागज़, पत्थर, चमड़ा;
- बाँस और बेंत, मोती और आभूषण, लाख, शीशा;
- चित्रकला और नक्काशी।
4. झरोखे से: 'गिल्लू'. यहाँ महादेवी वर्मा की अपनी कहानी 'गिल्लू' का अंश है: एक गिलहरी की कहानी, जो उनकी थाली के पास बैठकर एक-एक चावल उठाकर खाती थी, और जिसे काजू सबसे प्रिय था।
यह अंश परिचय की बात का प्रमाण है: उनके गद्य के चरित्र पाठकों को याद रह जाते हैं।
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