मत बाँधो
कविता का दूसरा भाग
कविता का दूसरा भाग पढ़िए और जानिए कि मुक्त सपने क्या कर सकते हैं।
मुक्त सपना क्या करेगा? दूसरा भाग बताता है कि अगर सपने को आज़ाद छोड़ दिया जाए, तो क्या होगा।
ऊपर जाएगा: "मुक्त गगन में विचरण कर यह / तारों में फिर मिल जायेगा"। सपना खुले आसमान में घूमेगा और तारों तक पहुँच जाएगा।
लौटेगा भी: "मेघों से रंग औ' किरणों से दीप्ति लिए भू पर आयेगा।" वह खाली हाथ नहीं लौटेगा: बादलों से रंग लेकर, और (सूरज की) किरणों से दीप्ति (चमक) लेकर।
सुंदर चित्र है: ऊपर जाना केवल दूर जाना नहीं; वहाँ से कुछ लेकर लौटना भी है।
सबसे बड़ी पंक्ति: "स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प / भूमि को सिखलायेगा!" जो सपना आसमान तक जाकर लौटेगा, वही धरती को स्वर्ग बनाने की कला सिखाएगा। यानी स्वर्ग इसी धरती पर बनना है।
यहाँ 'स्वर्ग' का अर्थ धन या सुविधा नहीं। स्वर्ग वह जगह है जहाँ आपसी सहयोग और सद्भाव हो, और सब प्राणी एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील (दूसरों का दुख समझने वाले) हों।
अंतिम निवेदन: "नभ तक जाने से मत रोको / धरती से इसको मत बाँधो!"
फिर टेक लौट आती है: "इन सपनों के पंख न काटो / इन सपनों की गति मत बाँधो!" कविता जहाँ से शुरू हुई थी, वहीं खत्म होती है।
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