मत बाँधो
सोच-विचार और शीर्षक
कविता और उसके शीर्षक पर गहराई से सोचिए।
सोच-विचार. इन प्रश्नों का कोई एक उत्तर नहीं, पर हर एक कविता को और गहराई से पढ़ने को कहता है।
1. 'मत बाँधो', 'पंख न काटो' किससे कहा गया होगा? कविता यह नहीं बताती। पर सोचिए, सपनों को कौन बाँध सकता है?
- बड़े लोग, माता-पिता, शिक्षक;
- समाज;
- परिस्थितियाँ (हालात);
- और कभी-कभी हम खुद: सपना देखने वाला ही 'यह संभव नहीं' कहकर अपने सपने को रोक देता है।
2. सपनों की और विशेषताएँ? सौरभ, बीज, धुआँ, आग से अलग, सपनों में और क्या खास है? आप खुद सोचिए। जैसे:
- सपना बाँटा जा सकता है, और फिर भी घटता नहीं;
- एक व्यक्ति का सपना अनेक लोगों का सपना बन सकता है; जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का भारत को आज़ाद कराने का सपना सब भारतीयों का सपना बन गया।
3. आरोहण और अवरोहण जीवन में: एक विद्यार्थी बड़ा लक्ष्य रखता है (आरोहण), और फिर रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ता है (अवरोहण: सपने को धरती पर उतारकर पूरा करना)। दोनों मिलकर ही काम करते हैं।
4. शीर्षक. कविता का नाम 'मत बाँधो' है: दो शब्द, और दोनों मना करने वाले।
आप नया नाम क्या देंगे? 'सपनों के पंख'? 'दोनों गति'? 'स्वर्ग का शिल्प'? 'मुक्त गगन'? हर नाम कविता का एक अलग पहलू सामने लाएगा। और कारण बताना उत्तर से अधिक ज़रूरी है।
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