मत बाँधो
कविता की रचना
जानिए कि कवयित्री अपनी बात सीधे न कहकर कैसे कहती हैं।
चित्रों में बात. कवयित्री अपनी बात सीधे नहीं कहतीं; चित्र बनाकर कहती हैं।
'सौरभ उड़ जाता है नभ में…', 'बीज धूलि में गिर जाता जो…', 'अग्नि सदा धरती पर जलती…': पढ़ते ही आँखों के सामने चित्र उभर आते हैं।
पुस्तक इसे सुंदर नाम देती है: "शब्द-चित्रों की लड़ी"। जैसे मोतियों की लड़ी में एक के बाद एक मोती पिरोए जाते हैं, वैसे ही यहाँ एक के बाद एक चित्र।
छह विशेषताएँ:
1. विपरीत अर्थ वाले शब्द: 'इसका आरोहण मत रोको / इसका अवरोहण मत बाँधो!' (एक-दूसरे के उलटे)
2. एक शब्द बार-बार: 'नभ तक जाने से मत रोको / धरती से इसको मत बाँधो!' 'मत' पूरी कविता में कई बार आता है।
3. समानार्थी शब्द: 'दीप्ति लिए भू पर आयेगा… भूमि को सिखलायेगा!' (भू = भूमि)। इसी तरह नभ और गगन।
4. प्रश्न: 'वह नभ में कब उड़ पाता है?' कविता उत्तर नहीं देती; प्रश्न ही उत्तर है।
5. संबोधन: 'इन सपनों के पंख न काटो': किसी से सीधे कहा जा रहा है।
6. सपने को मनुष्य की तरह दिखाना (मानवीकरण): 'स्वर्ग बनाने का फिर कोई शिल्प / भूमि को सिखलायेगा!' सिखाना मनुष्य का काम है, और यहाँ सपना सिखा रहा है।
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