नए मेहमान
गरमी का घर
एकांकी की शुरुआत पढ़िए, जहाँ गरमी से पूरा घर परेशान है।
गरमी से शुरुआत. एकांकी के पहले कई पृष्ठ गरमी के हैं। यह केवल मौसम नहीं: यही पूरी घटना की पृष्ठभूमि है।
गरमी के वाक्य (इन्हें पहचानना सीखिए):
- विश्वनाथ: "इन बंद मकानों में रहना कितना भयंकर है! मकान है कि भट्टी!"
- रेवती: "पत्ता तक नहीं हिल रहा है। जैसे साँस बंद हो जाएगी। सिर फटा जा रहा है।"
- विश्वनाथ: "सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो।"
- और: "चारों तरफ दीवारें तप रही हैं।"
प्यास नहीं बुझती. "पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। अभी चार गिलास पीकर आया हूँ, फिर भी होंठ सूख रहे हैं।"
रेवती का सिर-दर्द. यह यहीं से शुरू होता है और पूरी एकांकी में बना रहता है। वे बताती हैं कि पिछले पंद्रह दिन से दर्द के मारे सिर फट रहा है।
मकान की मुश्किल. रेवती इस घर को 'जेलखाना' कहती हैं। विश्वनाथ दो साल से 'दिन-रात एक करके' (बहुत मेहनत से) मकान ढूँढ़ रहे हैं, पर मिलता ही नहीं।
छत की मुश्किल. पड़ोसी लाला की छत खाली पड़ी है, पर उनकी पत्नी खाट नहीं बिछाने देतीं: "क्या छत तुम्हारे लिए है? नकद पचास देते हैं…" और उनका बहाना: "सब हवा रुक जाएगी।"
दो वाक्य, पूरा सार. विश्वनाथ कहते हैं कि गरमियों में अमीर लोग पहाड़ों पर चले जाते हैं। रेवती: "चले जाते होंगे। गरीबों की तो मौत है।"
रेवती की कामना: "ईश्वर करे इन दिनों कोई मेहमान न आए!" क्यों? घर में ठहराने की ठीक जगह नहीं, और उनकी अपनी तबीयत खराब है। यही वाक्य आगे की पूरी घटना तय कर देता है।
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