नए मेहमान
पड़ोसी और परेशानी
बाहर मेहमानों और भीतर पति-पत्नी की बातचीत के साथ एकांकी आगे पढ़िए।
दो जगह बातचीत. अब एकांकी दो ओर चलती है: बाहर मेहमान, भीतर पति-पत्नी।
रेवती का सीधा प्रश्न: "ये लोग कौन हैं? जान-पहचान के तो मालूम नहीं पड़ते।" विश्वनाथ: "क्या पूछ लूँ? दो-तीन बार पूछा, ठीक-ठीक उत्तर ही नहीं देते।"
बिजनौर? मेहमान कहते हैं कि वे बिजनौर से आए हैं। विश्वनाथ याद करते हैं: वे बहुत पहले एक बार काम से बिजनौर गए थे, "पर तब से अब तो बीस साल हो गए हैं।"
मिल या प्रेस? मेहमान कहते हैं कि उन्होंने विश्वनाथ को मुरादाबाद में सेठ जगदीशप्रसाद के यहाँ देखा था, 'उनकी आटे की मिल है'। विश्वनाथ: 'पर उनका तो प्रेस है।' नन्हेमल झट से: 'प्रेस भी होगा।' वे अंदाज़े लगा रहे हैं।
विश्वनाथ उन्हें लौटा क्यों नहीं पाते?
- संकोच (झिझक): वे खुलकर पूछ नहीं पाते;
- आतिथ्य की परंपरा: घर आए अतिथि को लौटाना कठिन माना जाता है;
- मेहमान हर बार बात टाल देते हैं।
खाने की बात. रेवती पहले साफ़ मना करती हैं: "पहले आत्मा फिर परमात्मा", यानी पहले अपना ध्यान, फिर दूसरा काम; जब शरीर ही ठीक नहीं, तो और क्या करें? विश्वनाथ बाज़ार से मँगाने को कहते हैं। रेवती: "बाजार से क्या मुफ्त में आ जाएगा? तीन-चार रुपये से कम में क्या इनका पेट भरेगा।" फिर कहती हैं: 'पहले तुम पूछ लो, मैं बाद में खाना बनाऊँगी।'
पूरे शहर की बात. विश्वनाथ: "आठ-नौ लाख आदमी इस शहर में रहते हैं और उनमें से छह-सात लाख आदमी इसी तरह के मकानों में रहते हैं।" यह एक घर की नहीं, पूरे शहर की कहानी है।
पड़ोसी की शिकायत. मेहमानों ने पड़ोसी की छत पर हाथ धोकर गंदा पानी फैला दिया। शिकायत ठीक है, पर ढंग कठोर: 'यदि मेहमान बुलाने हों तो बड़ा-सा मकान लो।' विश्वनाथ का उत्तर: "अरे भाई, मेहमानों को क्या मैं बुलाता हूँ?"
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