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आदमी का अनुपात

सोच-विचार के लिए

कविता के बारे में कुछ गहरे प्रश्नों पर सोचिए।

इन प्रश्नों का कोई एक उत्तर नहीं है। पर एक प्रश्न खास ध्यान माँगता है।

कवि ने क्रोध क्यों नहीं दिखाया? पुस्तक कहती है: "कवि ने मानव की सीमाओं और कमियों की ओर ध्यान दिलाया है, लेकिन कहीं भी क्रोध नहीं दिखाया।" कविता ईर्ष्या, अहं, घृणा जैसी कठोर बातें कहती है, पर कहीं डाँटती नहीं, किसी को दोषी नहीं ठहराती, और कहीं नहीं कहती 'ऐसा मत करो'।

इसका कारण: क्रोध से पाठक बचाव में आ जाता है। डाँट सुनकर हम अपनी सफ़ाई देने लगते हैं, सोचते नहीं। कविता केवल एक अनुपात दिखा देती है, और सोचने का काम पाठक पर छोड़ देती है।

कविता का भाव कैसा लगा? व्यंग्य भी हो सकता है, करुणा भी, और चिंता भी: इतने बड़े ब्रह्मांड में हम क्यों लड़ते हैं? जो भी चुनें, कारण ज़रूर दें।

'दीवारें उठाना' क्या केवल ईंट-पत्थर की दीवार बनाना है? नहीं। 'एक कमरे में दो दुनिया रचाता है': वहाँ कोई ईंट नहीं, फिर भी दीवार है। दीवारें मन में भी उठती हैं: बात करना बंद कर देना, किसी को पराया मान लेना, किसी से दूरी बना लेना।

मनुष्य खुद को सीमाओं में क्यों बाँधता है? कविता पाँच कारण गिनाती है: ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास।

सहयोग से क्या बदला है? सहयोग, समर्पण और सहिष्णुता से समाज में बड़े बदलाव आए हैं, जैसे:

  • बीमारी के विरुद्ध साझा अभियान (टीकाकरण);
  • आपदा में एक-दूसरे की सहायता;
  • साझा प्रयास से बनी संस्थाएँ, जैसे गाँव का विद्यालय।
'एक कमरे में दो दुनिया': वहाँ कोई ईंट-पत्थर नहीं, फिर भी दीवार है।

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