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राही मासूम रज़ा — टोपी शुक्ला

टोपी और इफ़्फ़न

इफ़्फ़न के परिवार और उसकी दादी के जीवन का परिचय देना।

लेखक और कहानी. यह राही मासूम रज़ा के उपन्यास का एक अंश है। दो पात्र हैं: बलभद्र नारायण शुक्ला (टोपी) और सय्यद ज़रग़ाम मुरतुज़ा (इफ़्फ़न)। दो अलग परिवार, अलग धर्म, अलग परंपराएँ, पर दोनों दोस्त एक-दूसरे के बिना अधूरे।

नारा नहीं, कहानी. लेखक कहता है: वह 'हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई' का नारा नहीं दे रहा; बस दो दोस्तों की कहानी सुना रहा है। दोस्ती अपने आप सब कह देती है।

इफ़्फ़न का परिवार. इफ़्फ़न के दादा-परदादा मौलवी थे और चाहते थे कि उनकी लाश करबला ले जाई जाए। पर इफ़्फ़न के पिता भारत के क़ब्रिस्तान में ही दफ़न हुए; उनका घर यही देश था।

इफ़्फ़न की दादी. दादी एक ज़मींदार की बेटी थीं: खुला घर, दूध-घी, गाना-बजाना। ससुराल के मौलवी माहौल में उनका मन कभी नहीं लगा; पति हर समय 'मौलवी' बने रहते। वे जीवन भर अपनी पूरबी बोली बोलती रहीं।

मायके की याद. मरते समय दादी ने कहा: मेरी लाश करबला या नजफ़ नहीं, मेरे मायके भेजना। उन्हें अपनी कच्ची हवेली और अपने हाथ से लगाया आम का पेड़ याद आ रहा था। इंसान की जड़ें अपनी मिट्टी में होती हैं।

टोपी और इफ़्फ़न: दो धर्म, दो घर, एक दोस्ती; और इफ़्फ़न की दादी, जिनकी जड़ें अपने मायके की मिट्टी में थीं।

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