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राही मासूम रज़ा — टोपी शुक्ला

'अम्मी' और दादी बदलने की इच्छा

'अम्मी' शब्द वाली घटना और टोपी-दादी के रिश्ते को समझाना।

इफ़्फ़न की प्यारी दादी. इफ़्फ़न को अपनी दादी सबसे प्यारी थीं। घर में बाकी सब कभी न कभी डाँटते, पर दादी कभी नहीं। रात को वे परियों और बादशाहों की कहानियाँ सुनातीं।

टोपी क्यों खिंचता? टोपी को इफ़्फ़न की दादी की पूरबी बोली अपनी माँ जैसी लगती। डाँटते हुए भी उनके शब्द मीठे लगते, 'शक्कर के खिलौनों' जैसे। अपनी दादी से उसे चिढ़ थी: वे उसकी बोली को 'गँवारों की बोली' कहतीं और ताने देतीं। इसलिए वह इफ़्फ़न के घर दादी के पास ही बैठा रहता।

'अम्मी, ज़रा भुरता'. एक दिन खाने की मेज़ पर टोपी ने अपनी माँ से कहा: 'अम्मी, ज़रा बैगन का भुरता।' सब सन्न रह गए; उसके घर में 'अम्मी' शब्द कैसे आया? पता चला, इफ़्फ़न से सीखा है। दादी खाना छोड़कर उठ गईं, और माँ ने उसे ख़ूब पीटा। बड़े भाई मुन्नी बाबू ने ऊपर से एक झूठी चुगली भी कर दी।

फिर भी नहीं माना. मार खाकर भी टोपी ने इफ़्फ़न के घर न जाने की बात नहीं मानी।

दादियाँ बदल लें? अगले दिन टोपी ने इफ़्फ़न से कहा: चलो, दादियाँ बदल लें; तुम मेरी ले लो, मैं तुम्हारी। इफ़्फ़न ने समझाया: मेरी दादी मेरे अब्बू की माँ भी हैं, ऐसे कैसे बदलें? तभी ख़बर आई कि इफ़्फ़न की दादी गुज़र गईं। टोपी अकेले कोने में बैठकर रोता रहा।

'अम्मी' कहने पर टोपी पिटा, फिर भी इफ़्फ़न की दादी का प्यार नहीं छोड़ा; दादी के जाने पर वह अकेले रोया।

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