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सृजनात्मकता और लेखन / Creativity and Writing

रोज़मर्रा और भाषा में सृजनात्मकता

भाषिक सृजन के उदाहरणों का विश्लेषण सिखाना।

सृजनशीलता इसमें है कि हम काम कैसे करते हैं: कहानी से इतिहास पढ़ाने वाला शिक्षक, कम आय में सुघड़ गृहस्थी चलाने वाली स्त्री, पौधों को पहचानने वाला माली; बँधा-बँधाया मशीनी रूटीन मानवीय गरिमा को गिराता है।

उदास को हँसाना, बोझ उठा देना, दृष्टिहीन को सड़क पार कराना भी सृजनात्मक है — 'संवेदनशीलता का उत्कर्ष ही सृजनशीलता है'; केदारनाथ सिंह कोलकाता में घायल गौरैया के लिए रुकी भीड़ और कविता के लिए जुटे हज़ारों श्रोताओं में यही रिश्ता देखते हैं।

भाषिक सृजन = नई बात को चुने हुए बेहतरीन शब्दों और उनके सधे हुए क्रम में कहना। निराला ने 'आमों में बौर फूटे हैं' को 'फूटे हैं आमों में बौर' करके पंक्ति में नया संगीत भरा, 'भौंरे' को 'भौंर' करके 'टूटे-फूटे' की तुक मिलाई।

नागार्जुन 'क्या लाल? क्या लाल?' में शब्दों से खेलते हैं; प्रेमचंद 'ईदगाह' में बिना बनावट के सीधी बात कहते हैं — सच को ज्यों का त्यों कहना आसान भी है, कठिन भी।

कभी गूढ़ भावों के लिए जटिल बिंब चाहिए: शमशेर की 'उषा' में भोर का नभ 'राख से लीपा हुआ चौका' और 'शंख जैसा नीला' है।

चुने हुए शब्द, सधा हुआ क्रम।

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