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साहित्यिक लेखन / Literary Writing

कहानी, उपन्यास और नाटक का विकास

गद्य विधाओं और नाटक के इतिहास को समझाना।

कहानी अलाव के पास और तारों के नीचे सुनाई जाने वाली लोक-कथाओं से बनी ('किस्सा गया वन में, सोचो अपने मन में'); विजयदान देथा की 'बाताँ री फुलवारी', 'अलिफ़ लैला', 'कथासरित्सागर' ऐसी ही हैं।

लिखित गद्य कविता के बाद आया, जीवन की जटिलता के साथ — निराला: 'गद्य जीवन संग्राम की भाषा है'; छापेखाने ने गद्य फैलाया। उपन्यास पिछले लगभग चार सौ वर्षों का रूप है।

कविता के बाद नाटक आया; पहले नाटक काव्यात्मक लिखे गए। नाटक को 'दृश्यकाव्य' कहते हैं — वह वर्णित नहीं, 'घटित' माध्यम है (उदाहरण: भारतेंदु की 'अंधेर नगरी' — टके सेर भाजी, टके सेर खाजा)।

नाटक को 'पंचम वेद' कहा गया; भरत का नाट्यशास्त्र; शास्त्रीय नाटककार भास, कालिदास, शूद्रक, विशाखदत्त, भवभूति ('स्वप्नवासवदत्ता', 'अभिज्ञानशाकुंतलम्', 'मृच्छकटिकम्', 'मुद्राराक्षस', 'उत्तररामचरित')।

बाद के रूप: लोक-नाटक (यक्षगान में नृत्य-मुद्रा, नौटंकी में गायन पर ज़ोर), पारसी नाटक, इब्सन से प्रेरित यथार्थवादी नाटक, और विसंगत (एब्सर्ड) नाटक — हिंदी में पहले भुवनेश्वर ने लिखे।

नाटक — वर्णित नहीं, घटित।

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