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साहित्यिक लेखन / Literary Writing

विधाओं के पार, और नाटक लेखन

नाटक लिखने के व्यावहारिक तत्त्व सिखाना।

साहित्य को केवल विधाओं में बाँटकर नहीं देखा जा सकता: विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास कवितामय है, 'अंधायुग' और 'राम की शक्ति पूजा' में नाटकीयता है; कृष्णा सोबती का 'हम हशमत' एक अनोखी शुरुआत वाला प्रयोग है।

'जसमा ओडन' (भवाई लोकनाट्य) में राजा से जसमा के सवाल — 'तुझे आता ही क्या है?' — हाथ के काम और स्वाभिमान का महत्त्व दिखाते हैं; ऐसे संवाद आस-पास की बातचीत सुनकर ही आते हैं — इसलिए संवाद डायरी में लिखते रहिए।

नाटक की विशेषता — समय का बंधन: वह हर बार वर्तमान में घटता है, इसलिए मंच-निर्देश वर्तमान काल में लिखे जाते हैं; और उसे बीच में रोककर फिर से शुरू नहीं किया जा सकता।

शब्द नाटक का शरीर है (वाचिक) — संक्षिप्त, सांकेतिक, क्रियात्मक; स्पीति के लोगों की तुकबंदी वाली बोली से नूर ज़हीर का 'मानस हिरण' बना; नाटककार रचनाकार के साथ कुशल संपादक भी हो।

सशक्त नाटक के संवाद अनकहे अर्थ खोलते हैं ('टू बी और नॉट टू बी'); रंगमंच प्रतिरोध का माध्यम है; चरित्र सपाट न हों; कथ्य अपना शिल्प स्वयं चुनता है — शास्त्रीय, लोक, पारसी, यथार्थवादी या नुक्कड़।

कथ्य अपना शिल्प खुद चुनता है।

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