साहित्यिक लेखन / Literary Writing
कविता से कविता बनती है
कविता के जन्म की प्रक्रिया उदाहरणों से समझाना।
उर्दू में 'शेर कहना' मुहावरा है — कविता पहले बोली जाती थी; सारे लोकगीत मौखिक हैं। लिखना बाद में आया, और कवि कान पर पेंसिल रखकर चलते थे।
कविता पढ़ते-पढ़ते भीतर कविता बनने लगती है। नागार्जुन की 'बहुत दिनों के बाद' में पाँचों इंद्रियाँ जागी हैं — फसल देखना, तान सुनना, मौलसिरी सूँघना, धूल छूना, तालमखाना और गन्ने का स्वाद।
कविता का कोई खास मुहूर्त नहीं; मुक्तिबोध के अनुसार विचार बोझ ढोते, रोटियाँ सेंकते, काम करते हुए आते हैं — कवि डायरी-कलम साथ रखता है।
'बतूता का जूता' की कार्यशाला में नरेश सक्सेना ने कविता को भोपाल के सूखते ताल से जोड़ा ('पानी की दूकान'), बच्चों ने चमगादड़ और गिरगिट से — एक कविता दूसरी को जन्म देती है, स्मृति इसमें बड़ी भूमिका निभाती है।
प्रेरणा कोशिश और आदत से आती है (डार्विन: संवेग भी हासिल की हुई आदत है); कविता की अलग भाषा नहीं — शेक्सपियर 'भाषा के भोज' से टुकड़े उठाते थे। मोती की तरह कोई चोट या धूलकण भीतर बेचैनी जगाता है जो रचना में जमता है; पर मनुष्य को कई मसौदे बनाने पड़ते हैं (वर्ड्सवर्थ: 'recollected in tranquility')।
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