संपादन / Editing
कथ्य और प्रस्तुति का संपादन
कथ्य-स्तर के संपादन की बात करना।
संपादन का एक अर्थ है कार्य की सम्यक पूर्ति — रचना जिस मकसद से लिखी गई, वह मकसद पूरा हो। इसके लिए जो कहा गया है और जो भाव है, दोनों को असरदार बनाना और गलतियाँ हटाना पड़ता है।
ज़रा-सा बदलाव भी लिखे हुए को निखार या बिगाड़ सकता है; इसलिए संपादक बात को असरदार बनाने के लिए उसका क्रम और रूप बदलता है।
सामाजिक विषयों में आँकड़े, तथ्यों का क्रम, विद्वानों के कथन, प्रामाणिक उद्धरण और सारणियाँ अहम हैं, और संपादक इन्हें नए ढंग से रख सकता है।
हर रचना के आकार की सीमा है: लंबी रचना को कथ्य बदले बिना छोटा करना या छोटी में उसी तरह की बातें जोड़ना पड़ सकता है (सृजनात्मक लेखन में यह कम होता है)।
रचनाकार के लिए संपादन का मतलब है रचना को गलतियों से मुक्त और जितना हो सके उतना असरदार बनाना — कुछ शब्द निकालना, कुछ बदलना, वाक्यों की बनावट सुधारना। इस तरह संपादन दोबारा देखना (रिव्यू) और फिर से लिखना भी है।
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