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किरन

दिन और रात

जानो कि बालिका के सोने पर किरन कहाँ जाती है।

कविता 'किरन' में किरन कहती है कि बालिका के सोने पर वह एक दूसरी दुनिया में जाकर वहाँ के बच्चों को जगाती है। ऐसा कैसे हो सकता है कि यहाँ रात हो और कहीं और उसी समय सुबह? इसका उत्तर तुम्हारी किताब 'वीणा' के पृष्ठ 6 पर 'इसे भी जानिए' में है।

किताब बताती है कि हमारी धरती गेंद की तरह गोल है। वह अपनी धुरी पर घूमती रहती है — धुरी को धरती के बीच से गुज़रती एक सोची हुई रेखा समझो, जिसके चारों ओर धरती लट्टू की तरह घूमती है। साथ ही साथ धरती सूर्य के चारों ओर चक्कर भी लगाती है; इस चक्कर को परिक्रमा कहते हैं।

सूर्य हर समय चमकता रहता है, वह कभी बुझता नहीं। पर गोल धरती का एक समय में आधा भाग ही सूर्य की ओर होता है। धरती का जो भाग सूर्य की ओर आ जाता है, वहाँ दिन होता है। और जो भाग दूसरी ओर, अँधेरे में होता है, वहाँ रात होती है। धरती घूमती रहती है, इसलिए हर जगह बारी-बारी से दिन और रात आते हैं।

किताब इसे एक आसान उदाहरण से समझाती है: एक जलती हुई बत्ती (टेबल लैंप) के सामने एक गोलक (धरती का गोल नमूना, ग्लोब) रखा है। बत्ती को सूर्य मान लो और गोलक को पृथ्वी। गोलक का जो आधा भाग बत्ती की ओर है, उस पर रोशनी पड़ रही है — वहाँ दिन है। दूसरा आधा भाग अँधेरे में है — वहाँ रात है।

अब कविता फिर से सोचो: जब बालिका की ओर वाला भाग अँधेरे में चला जाता है, तो धरती के दूसरे भाग पर सुबह होती है — वही किरन की 'दूसरी दुनिया' है!

गोल धरती अपनी धुरी पर घूमती है; उसका जो भाग सूर्य की ओर होता है वहाँ दिन होता है, और दूसरे अँधेरे भाग में रात।

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