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गंगा की कहानी

गंगा की यात्रा: दूसरा भाग

गंगा की यात्रा का दूसरा भाग पढ़ो।

आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 12 में गंगा आगे की यात्रा बताती है। कानपुर से चलकर वह प्रयागराज पहुँचती है। यहाँ यमुना नदी से उसका संगम होता है, यानी दोनों नदियाँ आपस में मिल जाती हैं। इस संगम पर भी हर बारहवें वर्ष कुंभ का मेला लगता है, जिसमें देश के कोने-कोने से लाखों लोग आते हैं।

गंगा कहती है कि चलते रहना, बहते रहना ही उसका काम है। आगे वह वाराणसी पहुँचती है। इस नगर का दूसरा नाम काशी है। यह बहुत बड़ा तीर्थ है।

वाराणसी से आगे कई नदियों को अपनी गोद में लेती हुई गंगा बिहार राज्य में पहुँचती है। वहाँ पटना, भागलपुर जैसे नगरों से होती हुई वह पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है।

पश्चिम बंगाल में गंगा की दो धाराएँ हो जाती हैं। एक धारा बांग्लादेश चली जाती है, जहाँ उसका नाम पद्मा है। दूसरी धारा कोलकाता (कलकत्ता) की ओर जाती है, जहाँ उसे हुगली कहते हैं।

अंत में गंगा बंगाल की खाड़ी में समुद्र से मिल जाती है। इस तरह हिमालय के गोमुख से शुरू हुई उसकी यात्रा समुद्र में पूरी होती है।

प्रयागराज में गंगा का यमुना से संगम होता है (जहाँ हर बारहवें वर्ष कुंभ लगता है), फिर वह वाराणसी (काशी), पटना और भागलपुर होकर पश्चिम बंगाल पहुँचती है, जहाँ उसकी दो धाराएँ — बांग्लादेश में पद्मा और कोलकाता की ओर हुगली — होकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती हैं।

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