न्याय की कुर्सी
कहानी: न्याय की कुर्सी
कहानी 'न्याय की कुर्सी' शुरू करो।
यह कहानी तुम्हारी किताब 'वीणा' के पाठ 2 'न्याय की कुर्सी' की है, जिसे लीलावती भागवत ने लिखा है। इस पाठ में हम कहानी की शुरुआत पढ़ेंगे और उसकी घटनाओं को सही क्रम में लगाना सीखेंगे।
बहुत पुरानी और ऐतिहासिक नगरी उज्जैन के बाहर एक बड़ा-सा मैदान था, जिसमें जगह-जगह मिट्टी के टीले थे। एक दिन वहाँ कुछ लड़के खेल रहे थे। उछलते-कूदते एक लड़का एक टीले पर चढ़ गया और अचानक ठोकर खाकर गिर पड़ा। उसने देखा कि उसे एक बड़े, चिकने पत्थर से ठोकर लगी थी।
लड़के ने अपने दोस्तों को बुलाकर वह पत्थर (शिला) दिखाया और बड़ी शान से उस पर बैठ गया। उसने कहा कि यह मेरा सिंहासन है, मैं राजा हूँ और तुम सब मेरे दरबारी; अपनी-अपनी फरियाद (शिकायत) लेकर आओ, मैं फैसला करूँगा। बाकी लड़कों को यह खेल बहुत अच्छा लगा। वे बारी-बारी से आकर कोई बनावटी (काल्पनिक) शिकायत सुनाते, गवाह बुलाए जाते, और राजा बना लड़का सवाल पूछकर अपना फैसला सुनाता। उन्हें इतना मज़ा आया कि वे रोज़ यही खेल खेलने लगे।
धीरे-धीरे यह बात चारों ओर फैल गई। लोग उस लड़के की न्याय-बुद्धि की चर्चा करने लगे और कहने लगे कि ज़रूर उसमें कोई दैवी शक्ति है। फिर एक दिन दो किसानों में ज़मीन को लेकर गंभीर झगड़ा हो गया। वे राजा के दरबार में जाने के बजाय टीले वाले लड़के के पास पहुँचे। लड़के ने दोनों की बात बड़े ध्यान से सुनी, और उसका फैसला सुनकर किसान दंग रह गए।
उस दिन के बाद नगर के सब लोग अपनी फरियाद लेकर उसी लड़के के पास आने लगे; राजा के दरबार में कोई नहीं जाता था। और हर कोई लड़के के फैसले से संतुष्ट होता था। जब यह बात राजा तक पहुँची, तो उसे बहुत गुस्सा आया, और उसने तय किया कि वह खुद जाकर देखेगा।
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