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न्याय की कुर्सी

राजा ने चबूतरा क्यों खुदवाया

जानो कि राजा ने चबूतरा क्यों खुदवाया।

यह तुम्हारी किताब 'वीणा' के पाठ 2 की कहानी 'न्याय की कुर्सी' का अगला हिस्सा है। अब तक तुमने पढ़ा कि उज्जैन के बाहर टीले पर बैठा एक लड़का ऐसा सही न्याय करता था कि पूरा नगर अपनी फरियाद लेकर उसी के पास जाने लगा, और राजा के दरबार में कोई नहीं जाता था।

लोग उस लड़के के न्याय की तारीफ़ करते नहीं थकते थे। जब यह प्रशंसा राजा के कानों तक पहुँची, तो उसे बहुत क्रोध आया। उसे यह सहन नहीं हुआ कि एक छोटा-सा लड़का अपने को राजा से अच्छा न्याय करने वाला समझे। उसे इन बातों पर विश्वास भी नहीं था, इसलिए वह खुद देखने निकल पड़ा।

राजा अपने पूरे लाव-लश्कर (साथ चलने वाले सैनिक और सेवक) के साथ मैदान में पहुँचा और बड़ी देर तक लड़कों का खेल देखता रहा। वह हैरान रह गया और अपने मंत्री से बोला कि लड़का सचमुच बहुत बुद्धिमान है; इतनी छोटी उम्र में इतनी समझ होना अचरज की बात है।

तभी किसी ने राजा को बताया कि यह वह रोज़ वाला लड़का नहीं है — वह तो बीमार है, आज उसकी जगह कोई नया लड़का टीले पर बैठा है। यह सुनकर राजा को और भी अचरज हुआ। उसने सोचा कि अगर नया लड़का भी उतना ही सही न्याय कर रहा है, तो ज़रूर चमत्कार लड़के में नहीं, पत्थर की इस कुर्सी में है। उसने उसकी जाँच करने की ठान ली।

राजा का इशारा मिलते ही वह जगह खोदी गई। पत्थर बाहर निकला तो पता चला कि वह पत्थर था ही नहीं — वह एक बहुत सुंदर सिंहासन था, जिस पर बारीक, सुंदर मूर्तियाँ खुदी थीं। उसके चारों पायों पर चार देवदूतों की मूर्तियाँ बनी थीं। देखते-देखते वहाँ भारी भीड़ जमा हो गई। विद्वान पंडितों ने बताया कि यह सदियों पुराना राजा विक्रमादित्य का सिंहासन है — वही राजा विक्रमादित्य, जो अपने न्याय और विवेक (समझदारी) के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। राजा ने उस सिंहासन को अपने राजदरबार में रखवा दिया।

लोगों से लड़के के न्याय की प्रशंसा सुनकर राजा खुद देखने आया; नया लड़का भी सही न्याय कर रहा था, इसलिए राजा ने सोचा कि चमत्कार पत्थर की कुर्सी में है — और खुदाई में राजा विक्रमादित्य का सदियों पुराना सिंहासन निकला।

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