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न्याय की कुर्सी

चारों मूर्तियों के प्रश्न

पढ़ो कि चारों मूर्तियों ने राजा से कौन-से प्रश्न पूछे।

यह तुम्हारी किताब 'वीणा' के पाठ 2 की कहानी 'न्याय की कुर्सी' का बीच का हिस्सा है। राजा ने राजा विक्रमादित्य का सिंहासन अपने दरबार में रखवा दिया था और सोचा था कि अब वह इस पर बैठकर प्रजा की फरियाद सुनेगा।

अगले दिन राजा जैसे ही सिंहासन पर बैठने लगा, किसी ने कहा — "ठहरो!" उसने चारों ओर देखा, कोई नहीं दिखा। वह फिर आगे बढ़ा, फिर वही आवाज़ आई। इस बार राजा ने हैरान होकर देखा कि सिंहासन के एक पाये पर बनी मूर्ति बोल रही है। पहली मूर्ति ने पूछा: क्या तुम इस पर बैठने योग्य हो? क्या तुम्हें पूरा विश्वास है कि तुमने कभी चोरी नहीं की? राजा ने शर्म से सिर झुका लिया और माना कि कुछ ही समय पहले उसने नाराज़ होकर अपने एक दरबारी की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था। मूर्ति बोली कि तब तुम योग्य नहीं हो, तुम्हें तीन दिन प्रायश्चित करना होगा — और पंख फैलाकर आकाश में उड़ गई।

राजा ने तीन दिन उपवास और प्रार्थना की। चौथे दिन वह फिर बैठने चला, तो दूसरी मूर्ति ने पूछा: क्या तुम विश्वास से कह सकते हो कि तुमने कभी झूठ नहीं बोला? राजा घबरा गया, क्योंकि किसी न किसी मुसीबत से बचने के लिए उसने कई बार झूठ बोला था। वह पीछे हट गया, और दूसरी मूर्ति भी उड़ गई।

फिर तीन दिन उपवास और पूजा-पाठ हुआ। इस बार राजा हिचकिचाते हुए आगे बढ़ा, तो तीसरी मूर्ति ने पूछा: बैठने से पहले बताओ, क्या तुमने कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाई? राजा फिर पीछे हट गया और तीसरी मूर्ति भी पंख फैलाकर उड़ गई।

तीन दिन और उपवास-प्रार्थना के बाद राजा सिंहासन की ओर बढ़ा, तो उसके पैर लड़खड़ा गए। अब चौथी मूर्ति बोली: ठहरो! जो लड़के इस पर बैठते थे, वे भोले-भाले थे, उनके मन में कोई कलुष (बुराई, मैल) नहीं था। अगर तुम्हें विश्वास है कि तुम इसके योग्य हो, तो बैठ सकते हो।

चारों मूर्तियों ने क्रम से पूछा — क्या तुमने कभी चोरी नहीं की, कभी झूठ नहीं बोला, कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाई — और चौथी ने कहा कि यहाँ बैठने वाले लड़कों के मन में कलुष नहीं था; हर बार राजा बैठ न सका और तीन दिन उपवास-प्रार्थना करता रहा।

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