न्याय की कुर्सी
कहानी का अंत
कहानी का अंत पढ़ो और उसकी सीख समझो।
यह तुम्हारी किताब 'वीणा' के पाठ 2 की कहानी 'न्याय की कुर्सी' का अंत है। तीन मूर्तियाँ उड़ चुकी थीं, और चौथी मूर्ति ने कहा था कि यहाँ बैठने वाले लड़के भोले-भाले थे, उनके मन में कोई बुराई नहीं थी; अगर राजा को विश्वास है कि वह योग्य है, तो बैठ सकता है।
राजा बड़ी देर तक सोचता रहा। फिर उसने मन ही मन कहा: अगर एक लड़का इस पर बैठ सकता है, तो मैं क्यों नहीं? मैं तो राजा हूँ! मुझसे ज़्यादा धनवान, बलवान और बुद्धिमान और कौन होगा? मैं ज़रूर इस पर बैठने योग्य हूँ। यह सोचकर वह पक्के (दृढ़) कदमों से सिंहासन की ओर बढ़ा।
पर ठीक उसी समय चौथी मूर्ति ने पंख फैलाए और पूरे सिंहासन को साथ लेकर आकाश में उड़ गई। राजा उस पर कभी नहीं बैठ पाया।
ऐसा क्यों हुआ? मूर्तियों ने राजा से धन, ताकत या बुद्धि के बारे में कुछ नहीं पूछा था। उन्होंने पूछा था कि क्या उसने कभी चोरी की, झूठ बोला या किसी को चोट पहुँचाई — यानी उन्होंने उसका मन परखा था। न्याय के इस सिंहासन पर वही बैठ सकता था जिसका मन साफ़ और भोला हो। लड़कों का मन ऐसा ही था, इसलिए वे बैठ पाए और सही न्याय कर पाए।
राजा ने चोरी की थी, झूठ बोला था, और अंत में भी वह अपने धन, बल और बुद्धि के घमंड में डूबा था। घमंड से भरा मन साफ़ मन नहीं होता। इसीलिए जैसे ही वह घमंड से आगे बढ़ा, चौथी मूर्ति सिंहासन समेत उड़ गई।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.