न्याय की कुर्सी
संज्ञा और विशेषण
संज्ञा और विशेषण पहचानना सीखो।
तुम्हारी किताब 'वीणा' के पृष्ठ 17 पर 'भाषा की बात' में कहानी 'न्याय की कुर्सी' का एक वाक्य है: "तीसरी मूर्ति भी उड़ गई।" किताब पूछती है — इसमें संज्ञा कौन-सी है, और कौन-सा शब्द उस संज्ञा की विशेषता बता रहा है?
संज्ञा वह शब्द है जो किसी व्यक्ति, जगह, चीज़ या जीव का नाम बताए — जैसे राजा, उज्जैन, मूर्ति, सिंहासन। इस वाक्य में 'मूर्ति' एक चीज़ का नाम है, इसलिए 'मूर्ति' संज्ञा है।
अब सोचो — कौन-सी मूर्ति उड़ी? तीसरी। 'तीसरी' शब्द मूर्ति के बारे में कुछ और बताता है। जो शब्द किसी संज्ञा का गुण या विशेषता बताए — वह कैसी है, कितनी है, कौन-सी है — उसे विशेषण कहते हैं। तो 'तीसरी' विशेषण है। विशेषण अक्सर अपनी संज्ञा से ठीक पहले आता है।
किताब ने कहानी से पाँच और वाक्य दिए हैं, जिनमें विशेषण खोजने हैं: 'एक दिन लड़कों का एक झुंड' में 'एक' (दिन और झुंड की गिनती बताता है); 'प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी' में 'प्राचीन' और 'ऐतिहासिक' (नगरी कैसी है), और 'लंबा-चौड़ा मैदान' में 'लंबा-चौड़ा'; 'छोटी उम्र' में 'छोटी'; 'सुंदर सिंहासन' में 'सुंदर'; और 'अच्छी खासी भीड़' में 'अच्छी खासी' (भीड़ काफ़ी बड़ी थी)।
विशेषण खोजने का तरीका: पहले संज्ञा खोजो, फिर उससे पूछो — कैसा? कैसी? कितना? कौन-सा? जो शब्द उत्तर दे, वही विशेषण है।
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