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साङकेन

दिल्ली और चौखम

पाठ 'साङकेन' शुरू करो और दिल्ली से चौखम की यात्रा पर चलो।

यह पाठ आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 4 'साङकेन' (पृष्ठ 33) से है। यह एक निबंध है, जिसमें अरुणाचल प्रदेश के एक त्योहार की बात है। पर पहले यह जानो कि वल्लरी वहाँ कैसे पहुँची।

वल्लरी के पिताजी अरुणाचल प्रदेश में चौखाम के मंडल कार्यालय में एक अधिकारी हैं। इस बार उन्होंने अपने परिवार को दिल्ली से अपने पास चौखाम बुला लिया है। दिल्ली से आई वल्लरी को दोनों जगहों में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है।

दिल्ली में सड़कों पर हर समय भीड़ रहती है। कारें और बसें हॉर्न बजाती रहती हैं, और आदमियों की लंबी-लंबी कतारें लगी रहती हैं। वहाँ शोर और भाग-दौड़ बहुत है।

चौखाम बिलकुल अलग है। वहाँ का वातावरण खुला और शांत है। जिधर भी नज़र डालो, हरियाली और फूल ही दिखाई देते हैं। और वहाँ के लोगों के चेहरों पर हमेशा मुस्कान रहती है।

'चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहना' का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि वहाँ के लोग सदा प्रसन्न रहते हैं। वे खुश होने का दिखावा नहीं करते — वे सचमुच खुश रहते हैं।

वल्लरी को दिल्ली में भीड़, हॉर्न का शोर और लंबी कतारें दिखती थीं, जबकि चौखाम का वातावरण खुला और शांत है, जिधर देखो हरियाली और फूल हैं, और वहाँ के लोग सदा प्रसन्न रहते हैं।

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