साङकेन
शोभायात्रा और मंदिर
साङकेन की शोभायात्रा और मंदिर के बारे में पढ़ो।
यह हिस्सा आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 4 'साङकेन' (पृष्ठ 33-35) से है। एक दिन वल्लरी के मित्र चाऊतान ने उसे अपने घर बुलाया। वल्लरी अपने पिताजी के साथ गई। चाऊतान के पिताजी उस समय घर की सफ़ाई कर रहे थे; मेहमानों को देखते ही उन्होंने काम छोड़कर उनका स्वागत किया। चाऊतान की माताजी कई तरह के स्वादिष्ट पकवान ले आईं।
सब पकवान खा ही रहे थे कि वल्लरी ने सड़क पर एक शोभायात्रा देखी। शोभायात्रा को जुलूस भी कहते हैं। कुछ लोगों के कंधों पर पालकियाँ थीं, और पालकियों में बड़ी-बड़ी, सुंदर मूर्तियाँ रखी थीं। सब लोग नाचते-गाते जा रहे थे और उनमें बहुत उत्साह था।
वल्लरी के पूछने पर चाऊतान ने बताया कि एक-दो दिन पहले ही उनके गाँव के लोगों ने नदी के किनारे एक नया मंदिर बनाया है। लोग बौद्ध-विहार से भगवान बुद्ध और उनके शिष्यों की मूर्तियाँ लाकर उस मंदिर में ले जा रहे हैं। मूर्तियाँ तीन दिन तक वहाँ रहेंगी, और गाँव के लोग रोज़ उन पर जल चढ़ाएँगे और पूजा करेंगे। वल्लरी के पिताजी ने पूछा कि क्या वे भी साथ चल सकते हैं। चाऊतान के पिताजी ने खुशी से हाँ कहा, और सब शोभायात्रा में शामिल हो गए।
मंदिर देखने लायक था। उसकी जालीदार दीवारें बाँस और बाँस की पतली पट्टियों से बनी थीं — इन पतली पट्टियों को खपच्चियाँ कहते हैं। बीच-बीच में पेड़ों की हरी-भरी टहनियाँ लगी थीं, और उनमें रंग-बिरंगे फूल खोंसकर सजाए गए थे। वल्लरी ने इतना सादा और सुंदर मंदिर पहले कभी नहीं देखा था।
फिर बौद्ध भिक्षुओं ने मंत्र पढ़ते हुए मूर्तियों को पालकियों से उतारा, उन्हें मंदिर में रखा, और उनकी पूजा करके उन पर जल चढ़ाने लगे।
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