साङकेन
साङकेन के बारे में
जानो कि साङकेन कौन-सा त्योहार है और इसे कैसे मनाते हैं।
यह हिस्सा आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 4 'साङकेन' (पृष्ठ 35-36) से है। मूर्तियाँ मंदिर में रखी जा चुकी थीं। हँसी-खुशी के उस माहौल में वल्लरी ने देखा कि लोग बालटियाँ भर-भरकर एक-दूसरे पर पानी डाल रहे हैं, और एक-दूसरे के चेहरों पर चावल का आटा भी लगा रहे हैं।
वल्लरी को लगा कि लोग होली खेल रहे हैं। तब चाऊतान ने उसे बताया कि आज उनके यहाँ साङकेन का त्योहार है, और आज से ही उनका नया वर्ष शुरू होता है। यानी साङकेन नए वर्ष के आरंभ का त्योहार है। तभी किसी ने वल्लरी और उसके पिताजी पर भी एक बालटी पानी डाल दिया, और वे भीग गए! लोग बहुत देर तक इसी तरह पानी डालकर साङकेन मनाते रहे।
चाऊतान ने बताया कि साङकेन तीन दिन तक ऐसे ही मनाया जाता है। तीसरे दिन बौद्ध भिक्षु मूर्तियों को फिर से पालकियों में रखकर बौद्ध-विहार वापस ले जाते हैं, और वहाँ मंत्र पढ़कर उन्हें उनकी जगह पर रख देते हैं।
चाऊतान के पिताजी ने बताया कि उसके बाद गाँव के लोग बौद्ध-विहार जाते हैं और भिक्षुओं को बार-बार दंडवत प्रणाम करते हैं। दंडवत प्रणाम का अर्थ है — धरती पर पूरा लेटकर, सिर झुकाकर प्रणाम करना।
भिक्षु लोगों को आशीर्वाद देते हैं। यह आशीर्वाद किताब के पृष्ठ 36 पर चार पंक्तियों में लिखा है — उसे वहीं पढ़ो। उसमें भिक्षु कहते हैं कि तुम्हारी खेती खूब अच्छी हो, तुम्हें कोई बीमारी न हो, सब लोग मिल-जुलकर नाचें-गाएँ, और नए साल में खुशी मनाएँ।
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