चतुर चित्रकार
कविता: चतुर चित्रकार
कविता 'चतुर चित्रकार' पढ़ो और एक चित्रकार और शेर से मिलो।
अपनी किताब 'वीणा' का पृष्ठ 61 खोलो और पाठ 6 की कविता 'चतुर चित्रकार' पढ़ो। यह कविता रामनरेश त्रिपाठी ने लिखी है और पृष्ठ 62 तक चलती है। कविता में एक छोटी-सी कहानी है — एक चित्रकार और एक शेर की। आओ, उसकी घटनाएँ क्रम से समझें।
एक चित्रकार जंगल में एक सुनसान जगह पर बैठकर चित्र बना रहा था। तभी अचानक वहाँ एक शेर आ गया। शेर को देखते ही चित्रकार बुरी तरह डर गया। अब नदी, पहाड़, पेड़ और पत्तों के चित्र बनाने का उसका सारा उत्साह खत्म हो गया।
शेर कुछ नहीं कर रहा था, बस चुपचाप था। यह देखकर चित्रकार ने थोड़ी हिम्मत जुटाई और शेर से कहा कि आप बैठ जाइए, मैं आपका एक सुंदर चित्र बना देता हूँ। शेर अपने सारे अंग समेटकर बैठ गया और बड़े ध्यान से चित्रकार की ओर देखने लगा। कुछ देर बाद चित्रकार बोला कि आगे का हिस्सा बन गया है, अब आप अपना मुँह दूसरी ओर कर लीजिए।
शेर पीठ फेरकर बैठ गया। बस, इसी मौके पर चित्रकार किसी चोर की तरह चुपके से वहाँ से खिसक गया। शेर बहुत देर तक आँखें मूँदे बैठा रहा और सोचता रहा कि इतनी देर क्यों लग रही है।
उधर झील के किनारे एक नाव थी और एक बाँस रखा था। चित्रकार ने नाव पकड़ी और राहत की साँस ली। फिर बाँस से जल्दी-जल्दी नाव चलाकर वह दूर निकल गया। इधर शेर समझ गया कि उसके साथ धोखा हुआ है, और वह झुँझलाहट से भर गया।
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