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चतुर चित्रकार

शेर के नाम और चित्रकार की युक्ति

शेर के अलग-अलग नाम सीखो और चित्रकार की युक्ति पढ़ो।

अपनी किताब 'वीणा' के पृष्ठ 61 और 62 खोलो और कविता 'चतुर चित्रकार' फिर से पढ़ो। इस कविता में शेर का नाम सीधे 'शेर' ही नहीं लिया गया — कवि ने उसे दो और नामों से भी पुकारा है।

कविता की शुरुआत में जब शेर आता है, तो उसे 'यम राजा का मित्र' कहा गया है। कहानियों में यमराज को मृत्यु का देवता माना जाता है। शेर जिसके सामने आ जाए, उसकी जान खतरे में पड़ जाती है — इसलिए कवि ने शेर को यमराज का मित्र कहा। यह सुनकर ही पता चल जाता है कि चित्रकार कितने बड़े खतरे में था।

दूसरा नाम चित्रकार खुद देता है। शेर के आगे का हिस्सा बनाने के बाद वह बड़े आदर से कहता है कि अब मुँह उधर कीजिए, 'जंगल के सरदार'। सरदार यानी मुखिया। शेर को ऐसा आदर भरा नाम सुनकर अच्छा लगा होगा, और वह चित्रकार की बात मान गया।

चित्रकार ने शेर को पीठ फेरकर बैठने को क्यों कहा? क्या उसे शेर की पीठ का चित्र बनाना था? नहीं! वह भागने की योजना बना रहा था। जब शेर का मुँह दूसरी ओर हो गया, तो वह शेर को दिखे बिना चुपके से खिसक गया और नाव से दूर निकल गया।

चित्रकार के पास शेर जैसी ताकत नहीं थी। उसने डर के बीच भी धीरज रखा, सोच-समझकर बात की और चतुराई से अपने प्राण बचा लिए। आखिर में खिसियाया हुआ शेर चित्रकार को 'कायर डरपोक' कहता है — पर यह नाम चित्रकार के लिए है, शेर के लिए नहीं। इसीलिए कविता का नाम है — 'चतुर चित्रकार'।

कविता में शेर को 'यम राजा का मित्र' और 'जंगल के सरदार' कहा गया है; चित्रकार ने उसे पीठ फेरकर इसलिए बिठाया ताकि वह भागने की योजना पूरी कर सके — उसने धैर्य और चतुराई से अपने प्राण बचाए।

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