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मेरा बचपन

मेरा बचपन

प्रेमचंद का संस्मरण 'मेरा बचपन' पढ़ो।

आपकी किताब 'वीणा' का पाठ 7 'मेरा बचपन' एक संस्मरण है — यानी लेखक की अपनी ज़िंदगी की सच्ची यादें। इसे हिंदी के बहुत बड़े कहानीकार प्रेमचंद ने लिखा है। इस पाठ में वे अपने गाँव के बचपन को याद कर रहे हैं।

लेखक कहते हैं कि बचपन की याद कभी नहीं भूलती। उन्हें अपना कच्चा, टूटा-फूटा घर याद आता है, पयाल (सूखी घास) का बिछौना याद आता है, नंगे बदन और नंगे पाँव खेतों में घूमना और आम के पेड़ों पर चढ़ना याद आता है। ये सब बातें आज भी उनकी आँखों के सामने घूमती रहती हैं।

बचपन में लेखक अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गाँव में एक मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाते थे। तब लेखक आठ साल के थे, और हलधर उनसे दो साल बड़े थे — यानी दस साल के। दोनों भाई सुबह-सुबह मटर और जौ का चबेना खाते थे।

लेखक को रामलीला देखने में भी बड़ा आनंद आता था। उनके घर से थोड़ी ही दूर पर रामलीला मैदान था, और जिस घर में रामलीला के पात्रों को सजाया जाता था, वह तो उनके घर से बिलकुल सटा हुआ था। दिन के दो बजे से पात्रों की सजावट शुरू होती थी, पर लेखक दोपहर से ही वहाँ जाकर बैठ जाते थे।

वहाँ वे दौड़-दौड़कर छोटे-मोटे काम करते थे — और वह भी इतने उत्साह से कि वे लिखते हैं, आज बड़े होकर अपनी पेंशन लेने भी उतने उत्साह से नहीं जाते!

प्रेमचंद बचपन में अपने चचेरे भाई हलधर (जो उनसे दो साल बड़े थे) के साथ दूसरे गाँव में मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाते, सुबह मटर-जौ का चबेना खाते, और पास के रामलीला मैदान में बड़े उत्साह से छोटे-मोटे काम करते थे।

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