मेरा बचपन
गुल्ली-डंडा और विलायती खेल
प्रेमचंद के प्यारे खेल गुल्ली-डंडा के बारे में पढ़ो।
पाठ 'मेरा बचपन' में प्रेमचंद अपने सबसे प्यारे खेल की बात करते हैं — गुल्ली-डंडा। वे इसे सब खेलों का राजा कहते हैं। आज भी जब वे लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखते हैं, तो उनका मन करता है कि वे भी जाकर साथ खेलने लगें।
लेखक के अनुसार गुल्ली-डंडे की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कोई खर्च नहीं है। न लॉन (घास का मैदान) चाहिए, न कोर्ट, न थापी (बल्ला)। किसी पेड़ से एक टहनी काटी, उससे गुल्ली बनाई, और दो लोग भी आ गए तो खेल शुरू!
इसके उलट, लेखक कहते हैं कि विलायती (विदेशी) खेलों का सबसे बड़ा ऐब यह है कि उनके सामान महँगे होते हैं। फिर भी लोग अंग्रेज़ी चीज़ों के पीछे इतने दीवाने हैं कि अपनी चीज़ें अच्छी ही नहीं लगतीं। उनके समय में स्कूल हर लड़के से साल के तीन-चार रुपये केवल खेलने की फीस लेते थे, पर किसी को यह नहीं सूझता था कि भारतीय खेल खिलाए जाएँ, जो बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि गुल्ली से आँख फूटने का डर रहता है। लेखक जवाब देते हैं: तो क्या क्रिकेट से सिर टूटने का डर नहीं रहता? उनके अपने माथे पर गुल्ली का दाग आज तक है, पर उनके कई दोस्त ऐसे भी हैं जिन्हें थापी (बल्ले) की जगह बैसाखी पकड़नी पड़ गई — यानी खेलते-खेलते इतनी चोट लगी कि बैसाखी का सहारा लेना पड़ा। मतलब, चोट का डर हर खेल में है।
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